माँ का शौक (संस्मरण)

88-साल की मेरी माँ को पढ़ने का बहुत शौक था। यद्यपि उनके दोनों आँखों का आपरेशन हो चुका था फिर भी जब कोई किताब उन्हें मिलता वे पढ़ने बैठ जाती और उसे तब तक नहीं छोड़ती, जब तक कि वे उसे पूरा पढ़ नहीं लेती। अपने घर के पेपर से उन्हें संतुष्टि नहीं मिलती तब वे पड़ोस से दूसरा पेपर लाकर पढ़ जाती। पढ़ने में वे इतनी तेज थी कि विज्ञापन, मेट्रीमोनियल और  नौकरी वाले कॉलम को भी नहीं छोड़ती थी। मैंने उन्हेँ संस्कृत में दुर्गासप्तशती और गीता पढ़ते देखा था। इसके अतिरिक्त कामचलाऊ अंग्रेजी भी वे बोल, समझ और पढ़ लेती थी।
पढ़ना-लिखना तो वैसे आम बात है, पर मेरी माँ के लिए यह खास इसलिए था कि उन्होंने कभी स्कूल का मुँह भी नहीं देखा था। उत्सुकतावश यही प्रश्न जब एकदिन मैंने माँ से पूछा तो वे बोली," छोटी थी, तभी माँ गुजर गयी। पढ़ने का मौका नहीं मिला। रहने के लिए अधिकतर मामा के घर जाती थी। पढ़ने में रुचि थी तभी वहाँ ममेरे भाई-बहनों को पढ़ते देखकर स्वयं पढ़ना-लिखना सिखने लगी। लगन की पक्की थी, इसलिए पढ़ना-लिखना आ गया।
माँ की ऐसी ही रुचि के कारण अपनी कहानी, व्यंग्य और संस्मरण आदि छपने की पहली सूचना मैं माँ को देती थी, क्योंकि उम्र के ऐसे दौर में भी माँ जिस उत्सुकता से पत्रिका खरीदने दुकान तक चली जाती थी या किसी से मँगाती थी...उसी उत्सुकता व लगन से वे पढ़ती, लोगों को पढ़ाती और फिर खुश होकर तारीफ के साथ-साथ  हौसलाअफजाई भी करती। उनके इस कृत से मेरा मनोबल काफी बढ़ता था।
" माँ " आज हम लोगों के पास नहीं है, पर अध्ययन के प्रति उनकी तल्लीनता, तत्परता और जागरुकता आज भी मेरी लेखनी की लेखन शक्ति बनी हुई है।
शत-शत नमन प्यारी माँ को।

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