कोयल की कुहू-कुहू (कविता)

लाॅकडाउन के इस दौर में,
जब चारों तरफ सन्नाटा है।
तब मेरे अमिया के पेड़ पर,
कोयल कुहू-कुहू कर गाती है।

कोयल गीत सुनाकर चहकती,
फिर दूसरे डाल पर उड़ जाती है।
कोरोना से बदरंग होती दुनिया में,
वह जीवन का मधुर राग सुनाती है

हर दिन एक सा नहीं होता जग में,
सब कुछ चलायमान हो जाता है।
धैर्य धरों और हिम्मत रखों, दिल में,
बदल बदलता है, बदलेगा एकदिन।

मुझे देखो मैं भी सुप्तावस्था में,
विश्राम करती विलुप्त हो जाती हूँ।
देख आम पर जब बौर लहराता,
मैं हुलसित हो वापस आ जाती।

ठौर-ठिकाना, सुख-दुख जीवन का,
अपनी रफ्तार में ही आगे बढ़ता है।
बीते पलों को बिसरा दो तन-मन से,  
बुझते दीप को प्रज्वालित कर लो मन से। 

दुख का पल जो आया था एकदिन,
वह अतीत बन विलीन हो जायेगा। 
अधियारें में उम्मीद की नयी किरण, 
फिर नया सूरज उग जागेगा जग में।

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