बलिया के दो पराठे (संस्मरण)

कहने को तो कोई भी यह प्रश्न चिन्ह लगा सकता है कि आखिर ये दो पराठा है क्या, और इस दो पराठे में ऐसा क्या स्वाद, मिठास और खूबी छुपा हुआ है..जो आज भी उसका महत्व आपके जेहन में ऐसा रचा-बसा हुआ है कि आप उसे भूली नहीं, बल्कि उसका मूल्यांकन करके उसे मुद्दा बनाकर लेखनी उठा ली और लिखने बैठ गयी है।
मेरी भूली-बिसरी स्मृतियों में दो पराठे का अस्तित्व सचमुच आज भी ऐसा ही घुला-मिला मिठास भरी यादें है, जिसके रसास्वादन का मजा मैं आज भी चटकारे लेकर लेती हूँ और आज आपको भी उसके रसास्वादन से सराबोर करने की वीणा उठा ली हूँ।

तो सुनिए...

आँखें मिंचते हुए उठो, दैनिक क्रियाकलापों से निवृत्त होने के बाद गर्मा-गर्म चाय के साथ दो मकुनी (सत्तू भरा पराठा), हरे मटर का पराठा या सादा  पराठा अचार के साथ का स्वादिष्ट नाश्ता जो तत्काल रखा हुआ मिलता था, वह अच्छा लगने के साथ ही मन को तृप्त भी करता था। यही कारण था कि सुबह-सुबह किसी परिवार में नाश्ते के समय में जो हलचल व उथल-पुथल नजर आता है वह वहाँ दिखता नहीं था। बल्कि इसे यूं कहे कि शांत भाव और सुगमता से अपने आप निबट सिर्फ इसलिए जाता था क्योंकि यहाँ सब कुछ व्यवस्थित था। 
दीदी के ससुराल बलिया में पंद्रह-सोलह सदस्यों और गाँव के  लड़के भजुराम की इतनी बड़ी पारिवारिक जिम्मेदारी सिर्फ एक बुजुर्ग की कमाई और एक बुजुर्ग की मेहनत के बलबूते पर बड़ी सुगमता, सरलता से और बिना किसी हिलहुज्जत के प्यार और त्याग के साथ आसानी व शांति से आगे बढ़ता रहा।  क्योंकि इसमें दो बुजुर्गों के सोच, संकल्प, समानता और व्यवस्था में सामंजस्य निभाने का गुण विराजमान था। इस प्रकार परिवार को एकसूत्र में बाँधने का जो सुंदर, सटीक तरीका से व्यवस्थित करने का जो सार्थक गुण दीदी के सास-ससुर माई और बाबू जी में मौजूद था...वह विरले लोगों में ही मिलता है।

बलिया दीदी के ससुराल से बी.एस-सी. करने का संयोग मेरा अचानक और मजबूरी में बन गया। वहाँ जाने पर पता चला कि यह कई परिवारों का संगम स्थल है। अपने बच्चों के अतिरिक्त भाई का परिवार और तीन रिश्ते के विद्यार्थियों का बड़ा कुनबा बनाना आसान है, पर उस कुनबे को व्यवस्थित करना इतना सरल नहीं था, जितनी सरलता से बाबु जी और माई ने उन्हें व्यवस्थित किया और सुचारू रूप से आगे बढ़ाया। 

खाने-पीने की क्रिया व व्यवस्था नियमित सुबह-शाम चलता ही था। इसके अतिरिक्त रात्रि में सबके भोजन करने के उपरांत जो काम बचता था, वह था सुबह के सबके नाश्ता का इंतजाम। इस काम को पूरा करती थी माई और चाची की लड़की माधुरी। ये दोनों लोग मिलकर दो-दो पराठा गिनकर चौदह-पन्द्रह लोगों के लिए निश्चित रूप से प्रतिदिन तैयार करती थी। सबकी जिम्मेदारी यह थी कि वह सुबह मंजन करने के बाद अपने हिस्से का दो पराठा और अपने स्वाद के अनुसार अचार लेकर सुबह बनी गर्मा-गर्म चाय के साथ खा ले। जाड़े में यह स्वाद इसलिए दुगुना हो जाता था क्योंकि उस समय पराठा भरा हुआ होता था। भीषण से भीषण गर्मी में पसीने की टपकती बूंदों के एहसासों के बीच या कपकपाती सर्दी में ठिठुरते बदन के साथ ...रात के साढ़े दस-ग्यारह के बीच जब हम रजाईयों के आगोश में सुखद निद्रा की चादर ओढ़ने की तैयारी में जुटे होते थे, उस समय माई का पराठा बनाने या रसोईघर को समेटने के कठोर काम में प्रतिदिन व्यस्त दिखना...मेरे नेत्र पटल पर चुधियाते हुए आज भी जीवंत है। तभी तो उस दो पराठे का स्वाद और तृप्ति मेरे लिए आज भी बहुमूल्य है। बलिया प्रवास बहुत सुखद और एक नयी पारिवारिक सहयोग और सामंजस्य की अनुभूति से पूर्ण था। क्योंकि यहाँ व्यर्थ की चिल्ल-पों या हलचल के बिना सब कुछ व्यवस्थित था तभी तो उस ममतामयी, समर्पित देवी और घर के मुखिया बाबू जी को याद करती हुई मैं श्रद्धा सुमन समर्पित करती हूँ।
उन लोगों के सोच और उसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया ही इतनी सुदृढ़ व मजबूत थी कि इतने लोगों को एक साथ एक चूल्हे पर व्यवस्थित करना आज की शहरी पीढ़ी के लिए समझना और उसका मूल्यांकन करना बहुत मुश्किल है। तभी तो उस परिवार में मेरा दो साल का समय बड़ी सरलता व सुगमता से सुकून भरा बीत गया।
माई और बाबू जी को मेरा शत-शत नमन।

1 comment:

Unknown said...

अच्छी यादें भूलती नहीं है

शंखनाद (कविता)