गलती मान ली (लघुकथा)

कटू वचन कभी-कभी अनायास ही किसी के मुँह से निकल कर हवा में लहरा जाता है, जबकि बोलने वाले का इरादा किसी को दुख पहुँचाना नहीं होता है। हवा में लहराता तीर शूल की भांति उसी को चुभता और ठेस पहुँचाता भी है, जो इसका असली हकदार होता है।
ऐसा ही कटू वचन भावना के मुँह से उस समय निकल गया जब उसके पति मनीष उसे चिढ़ाते हुए बोले थे ," तुम्हें मायके जाना है तो जाओ, पर मुझसे यह उम्मीद मत करना कि मैं तुम्हें लेने तुम्हारे मायके आऊंगा।"
बात यह हुई थी कि शादी के कुछ महीनों बाद एकदिन जब पूरा परिवार एक साथ चाय पी रहा था, उसी समय भावना अपने पति से मायके जाने के लिए जिद करने लगी, उसी समय उसके पति ने उपरोक्त बात कही थी।
मनीष की ये बातें छोटी सी थी, पर भावना को तीखी चुभती हुई सी लगी थी, तभी तो उसे गुस्सा आ गया। वह चिढ़कर बोली," आप को आने की जरुरत क्या है? जैसे सब यहाँ बिन बुलाये आते है, वैसे ही जब मेरी इच्छा होगी, मैं भी यहाँ आ जाऊंगी।"
यह कटाक्ष भावना ने अपनी बुआ सास पर किया था। वे जब चाहती, नाराज होने का बहाना करती, फिर बच्चों को छोड़कर अपनी सहेली सुधा जी के साथ तीर्थयात्रा पर निकल जाती। थोड़े दिनों बाद घूमघाम कर जब उनकी इच्छा पूरी हो जाती, तब वे यहाँ आ जाती।
कटाक्ष का तीर भावना ने हवा में चलायी , पर वह जाकर बुआ जी को बेंध गया। तभी तो ये बातें सुनकर सामने बैठी बुआ जी तपाक से उठी और बोली," अब मैं ही सुधा के घर चली जाती हूँ। यहाँ मेरी कोई इज्ज्त नहीं, इसलिए यहाँ रुकना बेकार है।" यह कह कर वे बुदबुदाते हुए वहाँ से चली गई।
बुआ जी के जाने के बाद मनीष बोले," तुम्हें इस तरह के बोल बोलकर किसी को उसकी मजबूरी का एहसास नहीं कराना चाहिए। फुफा जी के न रहने पर जब बुआ के रहने की विकट समस्या थी, तब मैं उन्हें अपने पास ले आया। तुम्हें इस काम में मेरा सहयोग करना चाहिए, ना कि कटू वचन बोलकर परिवार की शांति भंग करो।"
भावना शर्मिंदा हो गयी। वह तो मनीष की बातों से खुन्नस खाकर कटू वचन बोल दी थी, वरना उसका ऐसा कोई इरादा नहीं था। कटू वचन बोलना आसान है, पर उसे सम्भालना बहुत मुस्किल काम होता है। भावना ने अपनी गलती स्वीकार करके कठिन काम को आसान कर दिया। आगे से ऐसा न करने का आश्वासन भी दिया और बुआ जी को मनाकर आग्रह से सुधा जी के घर जाने से रोक भी ली। अपनी सही सोच के कारण भावना ने बदले माहौल को सम्भाल लिया। भावना के व्यवहार से मनीष भी आश्वस्त हो गये और मिलजुल कर चाय पीने का अधूरा कार्यक्रम जो कटू वचन के कारण बोझिल हो गया था ...वह सुचारु रुप से हँसी-खुशी के माहौल में चलने लगा।
 

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शंखनाद (कविता)