आस्था का केंद्र चित्रकूट धाम - भाग-3 (यायावरी)

प्रागैतिहासिक काल की गुफाओं, झरनों, उच्च शैल शिखरों व हैरान करने वाली कंदराओं के बीच चित्रकूट धाम स्थित है।

माँ की इच्छा थी..चित्रकूट घूमने की। इसलिए माँ जब वे मेरे पास आयीं, तब हमने चित्रकूट घूमने का प्रोग्राम बना लिया। यह उत्तर प्रदेश का एक जिला है जो मंदाकिनी नदी के तट पर बसा भारत के प्राचीन तीर्थ स्थलों में से एक है।चित्रकूट के प्रमुख दर्शनीय स्थल मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित है। इसी स्थान पर ऋषि अत्रि और अनसुइया ने ध्यान लगाया था। बह्मा, विष्णु और महेश ने चित्रकूट में ही  अनसुइया के घर जन्म लिया था। चारों ओर से विन्ध्यपर्वत श्रृंखलाओं और वनों से घिरे चित्रकूट को अनेक आश्चयों की पहाड़ी कहा जाता है। रामचंद्र जी अपने वनवास का ग्यारह साल यहीं सीता और लक्ष्मण के साथ बिताये थे। अतः ऐसे तीर्थ स्थल को देखने, समझने और घूमने के लिए हम माँ के साथ ट्रेन से कर्वी स्टेशन पहुँच गये, क्योंकि चित्रकूट पँहुचनें का हमारे लिए निकटतम सुविधाजनक रेलवे स्टेशन कर्वी ही था। वहाँ से हम चित्रकूट बस से गये। सबसे पहले हमने एक होटल में अपने ठहरने का इंतजाम किया। चित्रकूट प्रवास के समय हमने यहाँ के नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य व  पवित्र दर्शनीय स्थलों का भरपूर आनंद लेते हुए हम बार-बार अपना सुधबुध खोते रहे। एकबार तो नदी के किनारे शंकर भगवान की विशाल मूर्ति के सामने हमें भक्ति भाव ऐसा अनूठा अनुभव महसूस हुआ कि हम कहाँ किसी और दुनियाँ में आ गये है, क्योंकि उस समय हमें विचित्र स्वर्गीय सुख की प्राप्ति का आभास हुआ। माँ का भी यही हाल था। वे भी भावविभोर होकर आनंद के अतिरेक में डूब और उतरा रही थी। मुझे यह देखकर अपार संतुष्टि मिली।

यहाँ के प्रमुख धार्मिक स्थल निम्न है-

राम घाट

रामघाट वह घाट है..जहाँ भगवान राम प्रतिदिन स्नान करते थे। इसलिए सबसे पहले हम रामघाट गये। यहाँ हमने जी भरकर स्नान, दर्शन और पूजा-पाठ किए।असीम आनंद की पहली अनुभूति की पराकाष्ठा यहाँ हमें यही मिल रही थी इसलिए हमने यँहा का पूरा मजा लिया। इस घाट पर अनेक मंदिर तथा गोस्वामी तुलसीदास की प्रतिमा भारत स्थित थी। यहाँ अनेक धार्मिक क्रियाकलाप चलते रहते है।शाम को यहाँ आरती होती है जो मन को काफी सुकून और शान्ति प्रदान करती है।

कामदगिरि पर्वत

मान्यताओं के अनुसार आदिकाल में पर्वत से निकलकर प्रभु कामदनाथ विग्रह के रुप में प्रकट हुए। परिक्रमा मुख्य द्वार से प्रारम्भ होती है।चारों दिशाओं में चार द्वार है जिनमें विग्रह विराजमान है। अलौकिक छटायुक्त पर्वत के चारों ओर शनि मंदिर, महलों वाले मंदिर के पीछे गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लगाया गया पीपल का वृक्ष, उनके द्वारा लिखी गई रामचरित मानस की हस्तलिखित प्रति, माँ पयस्वनी का उद्गम स्थल आदि स्थान दर्शनीय है।
धार्मिक महत्व वाले इस पवित्र पर्वत की पाँच किमी की परिक्रमा हमने पूरे मनोयोग से धीरे धीरे, रुककर आराम से किया। कहते है श्रद्धालु यहाँ अपने मनोकामना के पूर्ण होने की कामना करते है। जंगलो से घिरे इस पर्वत तल पर अनेक मंदिर है। लोकप्रिय कामतानाथ और भरत मिलाप मंदिर यही पर है। मम्मी के चेहरे पर थकान के आसार तो दिख रहे थे पर उत्साह और लगन में कोई कमी नहीं थी।  इसलिए उन्होंने परिक्रमा अपने दम पर पूरे मनोयोग से पूरा किया।

मंदाकिनी धाट

मंदाकिनी नदी अनुसुइया के जंगलों से निकलती है। लेकिन इसके बहाव के स्थान पर अलग-अलग घाट है, जो अपनी अलग विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध है। टाठी घाट जंगलों के मध्य स्थित देवरहवा बाबा का साधना स्थल माना जाता है। यहाँ की धारा में थाली घूमने लगती है। सर्वाधिक लोकप्रिय स्थान राघव प्रयाग घाट, रामघाट, भरत घाट है। राघव प्रयाग घाट पर सरयू व पयस्वनी का संगम है। यहाँ पर राम ने अपने पिता दशरथ का पिंड तर्पण किया था।

हनुमान धारा

दूसरे दिन हम पहाड़ी के शिखर पर स्थित हनुमान जी की विशाल मूर्ति के दर्शन को गये। करीब तीन सौ सीढ़ी की चढ़ाई चढ़कर हम इस स्थान पर पँहुचें थे। हनुमानजी के बाएं हथेली पर झरने से पानी लगातार गिरता रहता है।कहते है यह धारा श्री राम ने लंका दहन से आए हनुमान के आराम के लिए बनवायी थी। पहाड़ी के शिखर पर सीता रसोई था। हमने यँहा से चित्रकूट के सुंदर दृश्य देखे।
इसके बाद हम जानकी कुंड, स्फटिक शिला, अनसुइया अत्रि आश्रम और गुप्त गोदावरी घूमने गये।

जानकी कुंड

राम घाट से दो किमी दूर मंदाकिनी नदी के किनारे जानकी कुंड था। जनक पुत्री जानकी यहाँ स्नान करती थी। यहीं पर रघुवीर मंदिर और संकट मोचन था।

स्फटिक शिल

जानकी कुंड से कुछ ही दूरी पर मंदाकिनी नदी के किनारे स्फटिक शिला अपने पूरे वैभव के साथ स्थित है। इस शिला पर सीता के पैरों के निशान मुद्रित है। कहते है..इस शिला पर बैठकर राम सीता यहाँ के प्रकृति के सुंदरता को देखते और आनंदित होते थे। राम ने यहीं बैठकर सीता का पुष्पों से श्रृंगार किया था।
इसके साथ ही जानकीकुंड, पंचवटी घाट, प्रमोदवन घाट, सूरजकुंड का घाट जहाँ माँ मंदाकिनी पश्चिम मुखी हो जाती है , देखने योग्य है। यहाँ घूमकर और स्फटिक शिला के दर्शन से मन को असीम शक्ति व शांति मिली।

अनसुइया आश्रम

महर्षि कर्दम की पुत्री और महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूइया का विशाल गुरुकुल वाला आश्रम शहर से 15 किमी दूर था।
हम ये सभी कुछ  देखते और घूमते हुए अनसुइया आश्रम पँहुचे। स्फटिक शिला से चार किमी दूरी पर घने वनों से घिरा यह आश्रम स्थित है। प्रकृति के सुंदरतम नैसर्गिक नजारों के बीच में एकांत में स्थित इस आश्रम में सुकून और शान्ति थी। आश्रम के सामने की कल कल करती साफ और शीतल  जल वाली मंदाकिनी नदी बह रही थी। मंदाकिनी नदी के सैकड़ों धाराओं के उद्गम स्थल का प्रत्यक्षरुप में दर्शन करके असीम आनंद की अनुभूति हुई। इस आश्रम में अत्रि मुनि, अनसुइया, दत्तात्रेयय और दुर्वासा मुनि की प्रतिमा स्थापित थी।

अमरावत
दृष्टांतों के आधार पर राम की दसवीं पीढ़ी के पूर्वज अयोध्या नरेश महाराज अम्बरीश यहाँ आकर घोर तपस्या किए थे। यह अनसुइया आश्रम सेतीन किमी दूर जंगलो में है।

भभका उद्गम

यह स्थान अनसुइया आश्रम से दो किमी दूर झूरी नदी का उद्गम स्थल है। यह स्थान गुरु गोरखनाथ की प्राचीन तपस्या स्थली माना जाता है।

गुप्त गोदावर

प्रकृति की अनमोल धरोहर गुप्त गोदावरी ऐसा स्थान है जहाँ पर आकर हमने अपना सुधबुध खो दिया। प्रकृति की विलक्षण कारीगरी वाली गुफाओं में नक्काशी देखने योग्य है। यह शहर से 18 किमी की दूरी पर थी। यहाँ दो गुफाएं थी। एक गुफा चौड़ी और उंची थी। इसका प्रवेश द्वार सँकरा होने के कारण इसमें आसानी से घुसा नहीं जा सकता है। गुफा के अंत में एक छोटा सा तालाब था जिसे गोदावरी नदी कहा जाता है। दूसरी गुफा लम्बी और सँकरी थीऔर जिसके नीचे पानी बहता रहता था। पानी में सम्भलते हुए हमने गुफा के अंतिम छोर का दर्शन किये। माँ के साथ पानी में रुक रुककर धीरे धीरे चलना बहुत रोमांचकारी था। यहाँ से जल निकल कर कुंड में जाती है पर इसकेबाद वह दिखाई नहीं देती है। यह रहस्य आज भी बना हुआ है।

भरत कूप

भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए भरत ने भारत के नदियों से जल एकत्रित करके यहाँ रखा था। अत्रि मुनि के कहने पर भरत ने जल एक कूप में रख दिया था। इसी कूप को भरत कूप के नाम से जाना जाता है। भगवान राम को समर्पित यहाँ एक मंदिर भी था।

वाल्मीकि आश्रम लालापुर

महर्षि वाल्मीकि की तपस्थली लालापुर चित्रकूट से इलाहाबाद जाने पर मिलती है।झुकेही से निकली तमसा नदी इस आश
रम के समीप से बहती हुई सिरसर के समीप यमुना नदी में मिलती है। पूरी पहाड़ी पर अलंकृत स्तम्भ और शीर्ष वाले प्रस्तर खंड़ बिखरे पड़े है, जिनसे इस स्थल की प्राचिनता का बोध होता है।

तुलसी पीठ

तुलसी पीठसेवा न्यास जानकी कुण्ड, चित्रकूट, मध्य प्रदेश में स्थित एक भारतीय धार्मिक और सामाजिक सेवा संस्था है। इसे हिन्दू धार्मिक नेता जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा 2अगस्त 1987 में स्थापित किया गया था।
वैसे आस्था से जुड़े श्रद्धालुओं की भीड़ यहाँ पूरे वर्ष रहती है पर यातायात के संसाधनों के अविकसित होने के कारण लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। निकटतम रेलवे स्टेशन कर्वी और शिवराज पुर है।इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली सभी प्रमुख शहरों से बस और टैक्सी की सुविधा हमेशा मिलती है।
यद्यपि यहाँ से अभी मन भरा नहीं था ...फिर भी तीसरे दिन हम वापिस अपने शहर लखनऊ आ गये ।
यद्यपि हमारी चित्रकूट की यात्रा पूरी हो गयी, पर मन न भरने के कारण यह यात्रा अधूरा ही लगता है। मम्मी का मन भी पूर्ण रुप संतुष्ट नहीं हुआ था पर उन्होंने अपने मन की बात तब बताई, जब हम वहाँ से निकल चुके थे। यदि मम्मी पहले ही मन की बात बताती तो हम मैहर देवी के मंदिर जाने के बजाय यहीं दो-तीन दिन और घूमते। खैर जो हो गया, वह हो गया। यदि मौका मिला तो फिर चित्रकूट जाने का या बाकी बचे अधूरे वर्णन को पूरा करने के लिए हम फिर आयेंगे।

No comments:

शंखनाद (कविता)