कैद में है बचपना (लेख)

एकल परिवार की पद्धति ने बच्चों के दायरे को पहले से ही सीमित कर दिया था। एक-दो-तीन बच्चों तक ही सीमित रहने वाले परिवार में बच्चे आपस में घुलमिल कर अपने मनोभावों को लड़कर,सुलहकर और खुशियाँ बाँटकर व्यक्त कर लेते है, पर जहाँ बच्चा अकेला होता है वहाँ उसे अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए या तो बड़ो पर या अपने स्कूल और पार्क के दोस्तों पर ही निर्भर होना पड़ता है। इन सब के बाद भी वह अपने को अकेला ही महसूस करता है। क्योंकि घर में कोई उसका हम उम्र नजर नहीं आता है। 
अब इस कोरोना काल में परिस्थितियाँ जब विपरीत हो गई, तब सभी बच्चों का बचपना शारीरिक गतिविधियों के बिना घर में कैद होकर सीमित व शिथिल हो गया है। अकेले रहने वाले बच्चों के लिए तो यह और भी ज्यादा कष्टकारी है।
उछलकूद, धड़ामचौकड़ी,अल्हड़ता, जिद्दीपने और फरमाइशों से धूम मचाने वाले मासूमों, नन्हें बच्चों और किशोरों का बचपन आज शांत, सरल और सहमा हुआ बस टीवी के चैनलों और मोबाइल में उलझकर रह गया है। उसकी मासूमियत भरी जिज्ञासा को शांत करने के लिए कोरोना काल के अदृश्य भयानक भय का खौफ दिखलाना कभी जरूरी हो गया था। वरना  उसकी उत्सुकता जारी ही रहता और उन्हें घर के सीमित दायरे में सम्भालना मुस्किल हो जाता। इसीलिए जो माँ-बाप अपने बच्चों को मोबाइल पकड़ाना सही नहीं समझते थे...अब वही बच्चों को मोबाइल-टीवी में व्यस्त देखकर खामोश है।
इस जागरुकता भरी जानकारी देने का असर ये पड़ा की बच्चे घर पर रहकर अपने क्रियेटिव कार्यों में जुट गये। कुछ दिन व्यस्तता में बीत गया। फिर शुरू हो गया खालीपन का दर्द। कुछ करने को नहीं बचा तो आन लाइन क्लासेज शुरु हो गये। बच्चे इसमें एक सीमा तक व्यस्त हो गये, पर सिर्फ मोबाइल में सर खपाना भी शारीरिक व मानसिक रुप से त्रस्त करने वाला ही साबित हुआ।
 कोरोना का वायरस शारीरिक क्षति पँहुचाकर वैश्विक महामारी के रुप में जाने कितने अपनों को बिछुड़ा रहा है..यह दर्द उस मानसिक पीड़ा को झेलने वालो दिल के कष्ट से ही समझा जा सकता है, जो इसे भुगत रहा है।
पर जहाँ कोरोना महामारी का संक्रमण फैला नहीं है, उस घर के लोग भी डर, भय के मकड़जाल में फँसकर अवसाद की काल कोठरी में बंद हो रहे है। जब घर के बड़े-बुजुर्ग डर से सहमें हुए अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे है, तब वे बच्चों को कितना संतुष्ट कर पा रहे होंगे? यह सोचने वाली बात है। यह विभिषिका समय के साथ ही जब समाज के सामने उजागर होगी तभी दहशत की पूरी दास्तान सामने आयेगी। तभी सारी बातें पूरी तरह सबके समझ में भी आयेगा।
बच्चे आज तनाव के चरम सीमा को पार कर चुके है। प्रारम्भ में उनमें जोश और उत्साह का लबरेज था। तब वे उत्साहित होकर बहुत से क्रियेटिव कार्य किए, पर अब वे निराशा के भवसागर में डूब व उतरा रहे है। इस निराशा से उबारने वाले अभिभावकों की मानसिकता जब स्वयं ही डगमगा और डूब रही है तब वे बच्चों को बचाने में कितने सक्षम होगें यह बताना कठीन है। माल, बाजार सब खुल गया, पर आजादी आज अनजान वायरस के मुट्टी में बंद है। जब अपनी आजादी ही कैद है तब हम अपने उस घुटें हुए मानसिकता को लेकर खुशी को कहाँ और कैसे खोजें? यदि हम कुछ हद तक खुशी खोजने में सफल भी होते है तो उस तरह की उन्मुक्त खिलखिलाने वाले कहकहे हम लगा नहीं पाते है। आज मानसिक विकार उत्पन होने वाले वीभत्स प्रश्न सुरसा की भांति मुँह बाये खड़ी है। अपनी प्रार्थना लेकर हम किस द्वार के सिटकनी को खटखटायें, क्योंकि जब सभी मंदिर के इष्ट देवता भी कोरोना वायरस के डर के कारण आज मानव बंधन में जकड़ गया है।
घर में रहो सुरक्षित रहो, जान है तो जहान है जैसे सशक्त नारा ही हमारी खिल्ली उड़ा रहा है। अब घर में रहकर शारीरिक रूप से स्वस्थ और प्रसन्नचित्त भी नजर आ रहे है, पर हम मानसिक रूप से पूरी तरह बीमार हो चुके है। जब सारा तंत्र व व्यवस्था ही पंगु हो गई है तो उसका वास्तविक रूप सामने आने में कितना समय बीताना पड़ेगा यह अनिश्चितता की गोद में छुपा हुआ एक ज्वलंत प्रश्न है।
आज के बच्चे कल के कर्णधार है, पर जब आज का बच्चा स्वयं स्वस्थ्य नहीं है तब वह स्वस्थ भारत का निर्माण कैसे कर पायेगा। यह विशाल प्रश्न दिल-दिमाग में कौध रहा है?
स्कूल कालेज खुल भी जाये तब भी बच्चों की जो आजादी, जो उन्मुक्त हँसी के फौव्वारे थे, कहकहे थे वह कोरोना के वैश्विक महामारी के डर में विलीन होता नजर तो आयेगा ही। हम किस भविष्य की ओर बढ़ रहे है...यह सोचना, समझना और बताना आज बहुत ही जटिल और अनसुलझा पहेली बनकर सामने खड़ा है...क्योंकि इसका उत्तर अभी किसी के पास नहीं है....और ना कोई दे पा रहा है।।।

No comments:

शंखनाद (कविता)