टिकाऊ रिश्ता (संस्मरण)

तीखे नोंक-झोंक और हँसी-ठिठोली के बुनियाद पर खड़ा मजबूत और टिकाऊ रिश्ता पति-पत्नी के बीच में होता है।
एकदिन मेरा अपने पति से तीखा अनबन हो गया। जिसके कारण काम तो हम सब ठीक और सुचारु रुप से निपटा रहे थे। पर आपस में प्रेमालाप पर पूर्ण प्रतिबंध था क्योंकि हनक व ठसक से दोनों का मन भरा हुआ था।
इसी समय एक शाम ये फलों के साथ रबड़ी लेकर आ गये। रबड़ी देखकर कुछ अजीब सा भाव मन में पनपा, पर उसकी गहराई में न जाकर उसे यूं ही छोड़कर काम में व्यस्त हो गई।
सुबह चाय के साथ मैंने चूड़ें वाली नमकीन बना लायी। ये केवल चाय पीये पर मैं चाय के साथ बनें नमकीन का भरपूर मजा ली। और फिर खाना बनाने में जुट गई। आटा गूंथ रही थी तभी पड़ोस की बेटी पारुल मेरे पास आकर बोली, "आंटी, मम्मी आपको पैर रंगने के लिए बुला रही है।"
"बेटा, अभी काम कर रही हूँ। थोड़ी देर बाद आऊंगी।" पारुल के जाते ही बेटी शालू जिद पर अड़ गयी कि वह पैर रंगवायेगी। मैं उसे लेकर पड़ोस में गयी तो मुझे पड़ोसन गरिमा सजी-सँवरी नये रुप में दिखी तो मैं अचकचाकर पूछी," आज कुछ है, क्या?" वे बोली," आज हरितालिका तीज है। आप व्रत नहीं है क्या?" मैं कुछ बोली नहीं पायी, बस शालू की इच्छा व्यक्त करके लौट आयी। ये व्रत तो मैं भी रहती हूँ। रबड़ी का राज खुल गया। ठनक के चलते ये बोले नहीं और रबड़ी लाकर अपने जिम्मेदारी का परम्परा निभा दिए पर मैं इस सांकेतिक संदेश को समझ नहीं पायी। अब मैं क्या करु? यह प्रश्न मेरे मन में कौधने लगा, क्योंकि यह व्रत छूटने के बाद दूबारा रहा नहीं जाता है। ऐसी मान्यता प्रचलित था।
मुझे यह व्रत रहना था अतः दस बजे को मानक मानकर मैं व्रत रह गई। मन में दृढ़ संकल्प था कि जो होगा, वह अच्छा ही होगा। अभी से नकारात्मक भाव से क्यों सोचूं? दस बजे मैंने पारन किया तो ये बोले, "मुझे तो पता ही था, पर मैं तुम्हें देख रहा था।" यह सुनकर मैं इनके सोच को मान गई कि ये महाशय मेरी निष्ठा को तौल रहे थे। मैं इस तौल में खरी उतरी या नहीं...यह मुझे पता नहीं, पर अपने तरीका से अपनी गलती सुधारकर मैं संतुष्ट थी।
तीज-त्यौहार और व्रत ये हमारी सामाजिक व पारिवारिक मान्यताएं होती है, जो जिंदगी में खुशियाँ और बदलाव को दर्शाती है। इसलिये इन मान्यताओं में अपनी खुशियाँ तलाशनी चाहिए, ना कि पुराने पाखंडों में फँसकर या डरकर अपनी खुशियाँ शहीद करना चाहिए। पुरानी परम्पराओं और भ्रांतियों में फँसकर अपनी खुशियाँ समाप्त न करने की खुशी मुझे आज भी होती है। 
 

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