कपड़ो वाली गुड़िया (लघुकथा)

काम वाली छाया की नन्हीं बेटी राखी की तबीयत ठीक नहीं थी। छाया राखी को लेकर सुधा आंटी के घर काम करने आ गई। राखी को एक तरफ बैठाकर वह काम में लग गयी। राखी के हाथ में एक कपड़ो की बनी और सजी हुई प्यारी सी गुड़िया थी। राखी उसी से खेलने में मगन हो गयी।
थोड़ी देर बाद सुधा जी की पोती मुनमुन वहाँ आई और राखी से गुड़िया छिनने लगी। बाल हठ के कारण राखी को अपनी गुड़िया देना मंजूर नहीं था, अतः वह गुड़िया को जोर से पकड़े हुए रोने लगी। गुड़िया न पाकर मुनमुन भी जोर से चिल्लाने लगी। रोने की आवाज सुनकर सुधा जी और छाया दोनों दौड़ती हुई आयीं। सुधा जी दोनों के बीच समझौता करा लेंगी, यह सोचकर छाया काम करने को लौट गयी। सुधा जी मुनमुन को समझाते हुए एक प्यारी सी डाॅल मुनमुन को देती हुई बोली, " लो अपनी प्यारी सी डाॅल से खेलो। यह गुड़िया राखी की है। उसे यह दे दो।"
मुनमुन झल्लाकर डाॅल को पकड़ी और फिर उसे जमीन पर पटक दी। और जोर-जोर से रोकर कपड़े वाली गुड़िया को लेने की जिद पर अड़ गयी। सुधा जी के बार-बार मनाने के बाद भीजब वह नहीं मानी, तब सुधा जी डाॅल को राखी को पकड़ा दी। और कपड़े वाली गुड़िया उससे लेकर मुनमुन को दे दी। मुनमुन का चेहरा खिल उठा। पहले अलग-अलग खेलने वाले बच्चे थोड़ी देर बाद एक साथ मिलकर खेलने लगे।
नयी और पुरानी परम्परा वाली दोनों गुड़िया को एक साथ देखकर सुधा जी की बाछें खिल गई। वे समझ गयी कि नयी परम्पराओं एवंं जरुरतों के बावजूद भी पुरानी परम्पराओं की चाहत और आकर्षण कभी समाप्त नहीं होगा। वे किसी ना किसी रुप में सामने आयेंगे ही और बरबस मन को आकर्षित करेंगे ही।
सुधा जी को याद आया अपना वह पुराना दिन, जब वे बड़ी लगन व जतन से अपनी बेटी सरिता के लिए कपड़ों वाली गुड़िया-गुड्डा  बनाया और सजाया करती थी। बच्चे जब गुड़िया - गुड्डा का व्याह रचाते थे तो वे भी उसमें सहयोग करती और खुशी-खुशी शामिल होती थी।
सुधाजी की आँखों में अचानक नयी चमक आ गई। वे अपनी भूली-बिसरी  पुरानी परम्पराओं  को जीवित करके अपनी पोती के हाथ में प्यारी सी कपड़ों वाली गुड़िया पकड़ाने के लिए झटपट उठी, फिर पुराने कपड़ो के साथ सूई-धागा को हाथ में लेकर बैठ गयी। पुरानी परम्पराओं को जीवित रखने का संकल्प उनके मन मे दृढ़ता से भर गया था। 

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