नया लो पुराना दो (लघुकथा)

'नया बर्तन लो, पुराना कपड़ा दो।' सड़क पर चीखती थी आवाज सुनकर राकेश जल्दी से अपने कमरे से निकलकर बाहर छज्जे पर आकर बोला, "अरे भैया, बर्तन वाले। जरा ठहरना। मैं अभी आ रहा हूँ नीचे।" यह कहकर राकेश जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ उतरते हुए नीचे आया और अपनी पत्नी को आवाज देते हुए बोला," मोहिनी, जरा सुनना। मैंने, कल जो पुराने कपड़ों वाली गठरी बनाया था, उसे लेकर बाहर आ जाओ।"
राकेश दरवाजे के पास पहुचाँ ही था कि पीछे से खिन्न मन से मोहिनी भी कपड़ों की गठरी लेकर पहुचँ गयी, बोली," लो जी, कपड़ों की गठरी आ गई।" यह कहकर वह कपड़ों की गठरी वहीं नीचे रखकर चली गयी।
"भैया, बीस कपड़े है। इसके बदले में कौन सा बर्तन दे सकते हो?"
राकेश कपड़ो के मोल-भाव में जुटा था और कमरें के अंदर मूक श्रोता बनी माँ अलका के कान खड़े थे। वह मन ही मन में राकेश के कारनामों से क्षुब्ध थी। वर्षो से संजोयी उसके अमूल्य खजाना को कोई झपटकर कोड़ियों के मोल बेचने जा रहा था और वह निर्बल -निसहाय लुटी सी, अजलस्त पड़ी सोच रही थी...' बेटा राकेश के पहले जन्मदिन वाला बेबी सूट, बेटी नीकिता का लहरियादार लहंगा-ब्लाउज, पति भूपेन्द्र की शादी के सालगिरह वाला रेशमी कुर्ता पैजामा और उसके शादी के समय के लाल गोटे वाली पियरी साड़ी...सब कितने शिद्दतों से सहेजे गये उसके  धरोहर...उसके लिये कितने अनमोल थे। वही धरोहर...आज बेटा के लिए बेजान और पुराने कपड़ें के रुप में बदल जरुर गये होंगें.. पर उसके लिए तो वहीं उसके जीने का सबल सम्बल था ..जिसे निर्मोही, निष्ठुर और असंवेदनशील बेटा ने परिवर्तन के नाम पर नवीनीकरण का वीणा उठाते हुए उससे उसका अधिकार छिनकर उसे बेजान अबला,असहाय और अस्तित्वहीन की श्रेणी में खड़ा करके उसे मृत्युप्राय कर दिया है। 
जिंदगी के दो राहें पर खड़ी अलका सोच रही थी,' क्या अपने ही कोख से जन्मी औलाद की भावनाएं इतनी असंवेदनशील हो सकती है जो माँ की संजीवनी, छिनते समय यह नहीं सोच पाती है कि ...कुछ दिन और ठहर जातेह...तो उनका कुछ नहीं बिगड़ता...पर माँ के जीने का आधार और खुशहाली तो बरकरार रहती।'

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शंखनाद (कविता)