दूर तो हूँ नहीं (संस्मरण)

शादी के बाद मैं पहली बार इनके सर्विस पर घर आयी थी। आॅफिस से आने के बाद ये थोड़ी देर खाना खाने तक घर पर रहते, फिर ये तुरंत यह कहकर कि अभी टहलकर आता हूँ, ये घर से निकल जाते। इनकी इंतजारी करते-करते मैं एक झपकी भी ले लेती थी। ये विलम्ब से आते और आते ही सो जाते। उनकी इस आदत से मैं बहुत परेशान थी। इन्हें टोकती या उलाहना देती तो हँसकर कहते कि कहीं दूर तो था नहीं। घर के बाहर ही दोस्तों के साथ गप्पे मार रहा था।
मैं चुप हो जाती, पर मुझे इनकी दलीलें पचती नहीं थी। अतः एक रात जब ये सोने चले गये, तब मैं चुपचाप दूसरे कमरे में जाकर सो गयी। फिर तो दूसरी-तीसरी रात भी मैंने यही अपनाया। तीसरी रात जब मैं नींद में थी, तभी मैं चौंक गई देखातो ये मेरे पास ही थे। मेरे पूछने पर ये बोले, "ये क्या है? यहाँ क्यों सो रही हो?" 
मुझे मौका मिल गया। मैं बोली,"मैं आपसे दूर तो हूँ नहीं। बस आपके कमरे के बगल  वाले कमरे में सो रही हूँ।" 
इन्होंने मुझे प्यार से उठाया और बोले, " साॅरी बाबा, मुझे अपनी गलती का आभास हो गया। आइंदा ऐसी गलती नहीं होगी।" 
छोटे से प्रयास से सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। इन्होंने मेरी भावना की कद्र की, तो मेरे मन में भी इनके प्रति प्यार और इज्जत बढ़ गया।

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शंखनाद (कविता)