गुब्बारा दुबारा मिल गया (संस्मरण)

खचाखच वाहनों के आवाजाही से व्यस्त जयपुर की सड़क...जिसके फुटपाथ पर चहलकदमी करते हुए हम लोग अपने होटल की ओर बढ़ रहे थे।अचानक नातिन अनुष्का के हाथ से सबसे बड़ा वाला गोल गुब्बारा छूटकर उड़ गया।
उँची उड़ान भरता हुआ गुब्बारा कभी किसी वाहन को छूने और चूमने को बेकरार उसके समीप पँहुचना चाहता तो उस वाहन की तेज हवा की फुफकार से उड़कर दूसरे वाहन के पास पँहुच जाता। इस प्रकार वह वाहनों के उपर मड़राने लगा।
हम लोग रुककर कौतुहलवश उसकी अठखेलियों वाली उड़ान का मजा लेने लगे और इस उम्मीद में नजरें टिकाये थे कि गुब्बारा अब फूटा कि तब। थोड़ी देर बाद अपनी उड़ान की मस्ती का आनंद लेने के बाद अचानक गुब्बारे ने अपनी दिशा बदली और हम लोगों से 20-25 कदम दूर पीछे फुटपाथ पर आ गया।
अपने पँहुच के दायरे में गुब्बारा को देखकर अनुष्का की दादी गुब्बारे की तरफ भागी। उन्हें गुब्बारा मिल जायेगा इस एहसास के कारण मैं आगे बढ़ने लगी। एकाएक उन्हें देखने के लिए मैं पीछे मुड़ी तो देखा कि गुब्बारा ठीक मेरे पीछे था। उनके हाथ से छूटे गुब्बारा को मैंने लपककर पकड़ लिया।
वह गुब्बारा.... जो अपने पँहुच के दायरे से बाहर हो चुका था, वह न उड़ा, न फूटा और न किसी और के हाथों में सहाया, बल्कि फिर लौटकर अपने ही हाथों में आ गया, तो हम सब इस अप्रत्याशित, अलौकिक व अंदरुनी आनंद में डूब गये। फिर विजयी मुस्कान के साथ आगे की ओर बढ़ गये।

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शंखनाद (कविता)