बालबांका (लघुकथा)

आधुनिकता के नये दौर में बूढ़े राकेश जी की भावनायें इतनी मृतप्राय एवं निर्जीव नहीं हो गई थी, जो अपने आँखों के सामने हो रहे अत्याचार को वे बर्दाश्त कर सकें। उनकी नजरें अखबार पर टीकी जरुर थी, पर निगाहें बार-बार घूमकर वहाँ पहुचँ रहीं थी...जहाँ तीन-चार हट्टे कट्टे नौजवान एक दुबली पतली लड़की को छेड़ रहे थे। राकेश जी मामले की नाजुकता भाप कर उठे और चुपचाप उस लड़की के पास वाली सीट पर जाकर बैठ गये और अखबार पढ़ने लगे। लड़कों को राकेश जी का हस्तक्षेप और हिम्मत बर्दाश्त नहीं था, पर राकेश जी के फौलादी सोच के आगे वे टिक नहीं पाये। उनकी बोलती बंद हो गयी। थोड़ी देर बाद वे कुड़बुड़ाते और बड़बड़ाते हुए वहाँ से उठे और चले गये। स्टेशन आने पर भी राकेश जी लड़की के ढ़ाल बने रहे और उसे छोड़ने बाहर टैक्सी स्टैंड तक आ गये। लड़की ने पिता तुल्य इस अजनबी के पावं छुयें और टैक्सी में बैठकर सुरक्षित रवाना हो गयी।
लड़की के जाने के बाद अपने लिए रिक्सा बुलाते समय न जाने कहाँ से वे चारों लड़के राकेश जी के सामने प्रगट हो गये और तड़ातड़ लातों घूसों से लहुलूहान करके उन्हें वहीं छोड़कर चले गये। भीड़ इस दुस्साहस का जवाब नहीं दे पायी। इस भीड़ भरे चौराहे पर  राकेश जी को बचाने वाला कोई शक्स आगे नहीं बढ़ा...बस वे वहाँ से चंद कदमों दूर खड़े होकर तमाशाबीन और मूक गवाह ही बने रहे।
एक हिम्मती अकेले बूढ़ें आदमी के सामने चार दरिंदे डरकर हार मान लिये और लड़की का बालबांका भी नहीं कर सकें, पर भीड़ भरे ढ़ेर सारे नपंसुकों के सामने वहीं लड़के अपने गलत इरादें को अंजाम तक पहुंचा कर शान से अकड़ते हुए चलें गये, पर उन लड़कों का कोई भी बालबांका नहीं कर सका।   
              

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