सूनी आँखों की चमक (लघुकथा)

अस्पताल के बिस्तर पर बैठी ललिता की सूनी और सूजी आँखें आँसुओं से तर-बतर थी। नौ महीने जिसे भ्रूण के रुप में कोख में रखा और बड़े अरमानों से सहेजती, पोसती और महसूस करती हुई आंनद से अभिभूत होती रही। और जिसके आगमन की उम्मीद और खुशियों को पलकों में समेटती रहती थी...वही समय पूरा होने पर निष्ठुर व निर्मोही बनकर उसे छलावा देकर उसके गोदी में आने से पूर्व ही न जाने कहाँ खो गया। ललिता को इस अप्रत्याशित दुखद पल की उम्मीद सपने में भी नहीं था। अब ललिता अपने सूने गोद को निहारती और उसे आँसुओं से सराबोर करती। ललिता के पति दीपक उसे सांत्वना दे रहे थे," ललिता, सब्र करके इस दुखद पल को किसी तरह गुजर जाने दो। खुशियाँ फिर आयेंगी। उम्मीद रखो, दुबारा माँ बनने के बाद तुम्हारी गोद फिर भरेंगी।"
ललिता विह्वल होकर बोली," लेकिन दीपक, मुझसे अब और अधिक सब्र नहीं होता। मैं इस सूने पल का क्या करु, जो मुझे हर पल बेचैन करके चैन से जीने नहीं देता है। ये मेरे किस अपराध की सजा थी।"
उसी समय एक नन्हीं बच्ची के रुदन ने वार्ड के लोगो का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। ललिता भी उधर देखने लगी। बच्ची के पिता बच्ची को बहलाने और चुप कराने की कोशिश में गोद में लेकर बहलाने की कोशिश में लगे थे। पर बच्ची चुप होने का नाम नहीं ले रही थी। ललिता की उत्सुकता बढ़ गयी। ललिता ने पता किया तो पता चला कि इस बच्ची की माँ थोड़ी देर पहले गुजर चुकी थी।
ललिता की ममता तड़प उठी। वह सधे कदमों से उठने लगी तो दीपक उसे रोकने लगे। वह दीपक के अनुरोध को अनसुनी करके बच्ची के पिता के पास पहुँच गयी। वह बच्ची के पिता की गोद से बच्ची को झपटकर गोद में ले ली, फिर वहीं बिस्तर पर बैठकर बच्ची को दूध पिलाने लगी। बच्ची का रुदन समाप्त हो गया। ललिता के इस कृत्य से बच्ची के पिता को तसल्ली मिली।
ललिता अपने बिस्तर पर लौट आई।  ललिता का सारा ध्यान बच्ची की तरफ ही खिंचा रहता था। वह दीपक से बच्ची को गोद लेने का मनुहार करने लगी तो दीपक ने साफ शब्दों में मना कर दिया कि वह किसी अपरचित के बच्ची को गोद नहीं लेंगे।
शाम को बच्ची का परिवार जाने लगा तो ललिता की बेचैनी बढ़ने लगी। वह दौड़कर बच्ची के पास गयी और उसे दुध पिलाने बैठ गयी। जाते-जाते उसने बच्ची के पिता का फोन नं ले लिया। दीपक उसे समझाते, कहते," देखों ललिता,अभी तुम्हारी उम्र माँ बनने की है। जब तुम फिर माँ बन सकती हो, तो हम क्यों एक अनजान का बोझ अपने सिर मढ़ ले।"
ललिता बोली," दीपक, मैंने नौ महीने एक बच्चे का बोझ अपने गर्भ में महसूस किया है। समझ जाओ वह मेरी ही बच्ची है और मैं उसकी माँ। नियति के इस संयोग को एक सुखद रुप में ढ़ाल दो। दूसरा बच्चा भी हमारा ही होगा, पर इस बच्ची से मेरी यह सूनी गोद तो इस समय भर जायेगी।"
ललिता की बीमारी बढ़ने लगी। दीपक ललिता के जिद और बीमारी के आगे झुक गये। बच्ची के पिता की सहमति से बच्ची ललिता के पास आ गयी। ललिता ने अपने सूने गोद को आबाद कर अपने जीने का उद्देश्य ढ़ूढ़ लिया। ललिता की सही व सकारात्मक सोच ने उनके मायूस होते पल को खुशियों में बदल दिया और बिन माँ की बच्ची को ममतामयी माँ का उपहार दे दिया।
बाद में ललिता ने एक बेटा को जन्म दिया। दो बच्चों की माँ बनने पर ललिता अपने को पूर्ण मानने लगी और सुखमय परिवार में रच-बस गयी।

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शंखनाद (कविता)