चूजें की भूल (बाल कविता)

देखो, मुर्गी दौड़ रही है,
अपने चूजे को ढ़ूढ़ रही है।
उसने चूजे को समझाया था,
दूर नहीं, तुम्हें कहीं जाना है।

मेरे नयनों के सामने ही,
आसपास तुम्हें मड़राना है।
पर चूजा था बहुत शैतान,
माँ का कहना, उसने बिसराया।

दाना चुन-चुन खाने लगा,
फिर आगे-आगे बढ़ने लगा।
मस्ती उसे रास आने लगा,
अकड़कर वह चलने लगा।

संगी-साथी को पीछे छोड़कर,
वह खुद ही खुद टहलने लगा।
देखो, चूजा बहक गया है,
अपने प्रियजनों से बिछुड़ गया है।

तभी सामने एक कुत्ता आया,
कुत्ता ने चूजा को अकेला पाया।
जीभ लपलपा गयी जब उसकी,
चूजा यह देखकर घबड़ाया।

माँ उसे तब कहीं नजर न आयीं,
गुम हो गयी तब उसकी अंगड़ाई।
माँ-माँ कहके, वह चिल्लाया,
कुत्ता को उसने पीछे पाया।

चूजा मुड़कर सरपट भागा,
माँ के पास आकर जान बचाया।
मुर्गी माँ ने कुत्ता को आँख तरेरा,
कुत्ता तब डरकर पीछे भागा।

मुर्गी ने चूजा को ड़ाट लगाई,
चूजा कान पकड़कर माफी मांगा।
नहीं करेगा कभी फिर ऐसी गलती,
सभी बड़ो की बात मानेगा।

वे बच्चे, जो गलत को सही समझते है
माँ-बाप का कहना वही नहीं मानते है
बड़ो की सींख, जब वे सही पाते है,
वे ही पीछे फिर पछताते है।

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