एहसास (लघुकथा)

"बेटा गुंजन, बहुत हो गया दादी के साथ मस्ती मारना। अब आ जाओ, होमवर्क पूरा करना है।" 
गुंजन को आवाज देकर रश्मि बुदबुदाने लगी,' ये लड़का, जब देखो तब दादी के कमरे में घुस जाता है। मेरे साथ कभी इस तरह बिंदास खेलता भी नहीं है। दादी,दादी...इसे बस हर समय दादी ही चाहिए जैसे मैं कुछ हूँ ही नहीं।' गुंजन का दादी के साथ ज्यादा घुलना-मिलना रश्मि को रास नहीं आता था। इसलिए वह वक्त बेवक्त गुंजन को टोकती और अपने अधिकार क्षेत्र में दबाकर रखने का प्रयास करती। रश्मि अपने संकुचित सोच के दायरे में बँधी रहती। वह गुंजन के शारीरिक व मानसिक विकास के गति को अवरुद्ध कर अपने अहम् को संतुष्ट करने का असफल प्रयास करती। इसी लिए वह हर समय खिन्नता के घेरे में बँधी रहती थी,जिससे उनके चेहरे का तेज मलिन हो जाता था।
माँ की कड़कती आवाज को अनसुनी करके गुंजन दादी के साथ ही खेलता रहा। उसी समय रश्मि दादी के कमरे में आकर तल्खी से बोली, "गुंजन, कब से आवाज लगा रही हूँ। सुनते क्यों नहीं हो? चलो जल्दी करो। मेरे पास समय नहीं है।"
अब भी गुंजन अपने में मस्त था। उस पर रश्मि के बात का कोई असर नहीं हुआ तो रश्मि उसे पकड़कर ले जाने लगी। दादी से देखा नहीं गया। वह बीच बचाव करती हुई बोली," जाने दो बहू, बच्चा है, खेलने दो। होमवर्क बाद में कर लेगा।"
" मम्मी जी, आपके दुलार ने ही इसे बिगाड़ा है। ये ऐसे नहीं मानेगा। इसे जबरदस्ती ही ले जाना पड़ेगा।" यह कहकर रश्मि गुंजन को साथ ले जाने लगी।
उसी समय रश्मि की सहेली अनामिका दरवाजे पर खड़ी यह नजारा देख रही थी। रश्मि की नजर जब अनामिका पर पड़ी तब वह गुंजन का हाथ छोड़कर अनामिका को साथ लेकर कमरे में आ गयी। क्रोध और शर्मिंदगी के मिश्रण भाव से रश्मि का चेहरा तमतमाया हुआ था।
अनामिका को पाकर रश्मि बिफर पड़ी, बोली," देख रही हो अनामिका। इस लड़के के जिद से मैं परेशान हो गई हूँ। यह मेरे तो अधिकार क्षेत्र से ही निकल गया है। मेरी बातें बिलकुल सुनता नहीं है। अब तुम ही कोई उपाय सुझाओं वरना मैं तो इसके लिए बहुत चिंतित और परेशान हो जाती हूँ।"

अनामिका बोली," धैर्य और समझदारी की बातें तेरे समझ में नहीं आता है, क्या? जिस घर में दो-तीन बच्चे होते है, वहाँ किसी तीसरे की आवश्यकता उतनी नहीं पड़ती है जितनी अकेले रहने वाले को पड़ती है। तेरा एक बच्चा है। अकेला बच्चा हर समय माँ-बाप के सीमित दायरें में बँधकर नहीं रह सकता। अपनी भावनाओं को साझा करने और अपने कामों के लिए उसे जो सहयोग और समीपता चाहिए... वह घर में उसे अपने बुजुर्गो से ही मिलता है। खुला दिमाग और खुली छूट बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास के लिए जरुरी होता है इसलिए अपने बच्चे के पैरों में जंजीर मत बाधों। उसके विकास की गति अवरुद्ध न करके गतिशील बनाओं। वह अपने दादी-नानी के पास ही तो समय व्यतीत करता है, किसी गैर के पास जाये, तब उसे रोकना तुम्हारा फर्ज बनता है। अपने संकुचित सोच को जरा खुली हवा में विचरनें की छूट दो, तब तुम्हें अपनी गलती का एहसास होगा। बुजुर्गो के साथ रहने से बच्चों के विकास में जो परिवर्तन आयेगा, वह अपने आप तुम्हें दिखने लगेगा।"
"तेरे नजरिए में तो बहुत दम लगता है। मैं तो ऐसा कभी सोच भी नहीं पाती।" रश्मि संतुष्ट होकर बोली।
तब अनामिका उठते हुए बोली, "बहुत दे दी तुझे सीख। अब जाने की इजाजत दे दे।"
"अनामिका, आज तुमने मेरी आँखें खोल दी, वरना नासमझी में तो मैं अपने बेटा का ही बुरा करने जा रही थी। शुक्रिया मेरी दोस्त।"
"दोस्ती में शुक्रिया नहीं चलता है। आज जल्दी में हूँ। अगली बार बिना चाय पीये खिसकने का नाम नहीं लूंगी।" यह कहकर अनामिका चली गयी। रश्मि अपने विचारों में ड़ूबी थी कि तभी दादी के कमरे से आती दादी-पोता के बिंदास ठहाकों ने उसे चैतन्य कर चकित कर दिया। अब वह अपने संकुचित सोच के बंधन से मुक्त थी। इसलिए वह  भी मंद-मंद मुस्कुराने लगी।

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शंखनाद (कविता)