मुर्गा-मुर्गी (अटूट रिश्ता-7) (यादगार लम्हें)

पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं के साथ व्यतीत कियें हुए अंतरंग अनुभव (अटूट रिश्ता-7)

जब भी मैदान में स्वतंत्रतापूर्वक दाना चुगते मुर्गा-मुर्गी को देखती तो बचपन का बस्ती तहसील वाले क्वाटर की याद   ताजा हो जाती। पापा तहसीलदार थे। सरकारी बड़ा सा बंगला और चपरासियों का जमावड़ा। इन्हीं चपरासियों के भरोसे यहाँ जीव-जंतुओं का भी लालन-पालन सही तरीका से होता था। गाय, मुर्गा-मुर्गी, कुत्ता हमारे पालतू जानवरों में थे।
15-20 मुर्गा-मुर्गी यहाँ क्वाटर के बाहर बने दरबें में रहते थे। दिनभर ये तहसील के खुले जगह में स्वतंत्रता पूर्वक टहलते हुए ये दाना चुगते और आपस में लड़ते और दानों का छिना-झपटी भी करते थे। मुर्गा कुकड़ू कूं करते हुए  मुर्गी से रासलीला करता और लड़ते हुए परेशान भी करता।
इन मुर्गा-मुर्गी के साथ हम बच्चे भी अपना मनोरंजन करते और मजा लगाते थे। हम इनको दौड़ाते, डराते और पकड़ने की कोशिश करते। इस समय इनके मन में जो डर व्याप्त होता, हम उससे अनजान होकर बस अपने सुख, खुशी और मनोरंजन का ही सोचते थे। बालपन की अल्हड़ता यही थी। यद्यपि हम इतने अल्हड़ और नादान भी नहीं थे। कक्षा सात में पढ़ते थे। पर उस समय की नादानी... कुछ कह नहीं सकती। मजा तो मजा ही होता है। और हम उस मजे में तल्लीन हो सब कुछ भूल जाते थे।
पर एक बात है। इतना समय बीतने के बाद भी मुझे वह प्यारी सी सुनहरी भूरी मुर्गी मेरे स्मृति पटल पर आज भी जीवित है, जो अपने रंग और खूबसूरत मुलायम चमकीले,  चपटे गद्दीदार पीठ की वजह से सबसे अलग और सबकी प्रिय थी। कहते है जो ज्यादा प्रिय होता है उसी को परेशान भी ज्यादा किया जाता है। हम भी इस मुर्गी के पीछे ज्यादा पड़ते थे। इसके पीठ पर मिट्टी या कंकड़ रखते तब यह भागती। भागती और डरती हुई इस मुर्गी की पीठ पर कंकड़ कुछ देर टिकने के बाद ही गिरता था। हम लोगों का मजेदार खेल यही था कि किसका कंकड़ कितने देर टिकता है। हमें उस समय मुर्गी के डर का कोई एहसास नहीं था। हम तो अपने मस्ती में चूर दिखते थे। हम लोगो को मुर्गी के अंड़ा बीनने में भी बहुत मजा मिलता था। कौन कितना अंड़ा पाया, यह हमारे होड़ का जरिया था।
हम लोगों के इस मजेदार खेल का दुखद अंत उस दिन हो गया जब शाम को बाड़े में आने के बाद एक-एक करके मुर्गियाँ और मुर्गे मरने लगे। दुख और आश्चर्य में ड़ूबे जब सभी लोगों ने जानकारी बटोरी तब पता चला कि गोदाम में बाँटने के लिए आया हुआ चना रखा था। मुर्गियों ने छककर चना खाया था। शाम होते-होते चना जब फूलने लगा तब मुर्गियाँ उसे बर्दाश्त नहीं कर पायी और इस दुनियाँ से चली गयी। हम लोगों ने भी मुर्गियों के पेट को टटोलकर देखा था। गोल-गोल चना जैसे एक थैले में बन्द हो ऐसा अनुभव हुआ। एक साथ इतने साथियों का बिछुड़ना बहुत दुखदायी था। जीवन के यादगार लम्हों में एक कष्टकारी लम्हा यह भी था, जो दिल में दर्द लिए हुए आज भी जीवित है।
मुर्गे-मुर्गियों का ऐसा साथ फिर कभी नहीं मिला। फिर भी कहीं भी जब मुर्गे-मुर्गियों का जमावड़ा कहीं भी दिखता, मैं पल दो पल ठहरकर उन्हें निहारना और अपने प्यारी बिछुड़े हुए मुर्गे-मुर्गियों को याद करना नहीं भूलती हूँ। 

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शंखनाद (कविता)