सूखी पत्तियाँ (कविता)

सूखी पत्तियाँ
जो पहले सूखी नहीं थी
सिर्फ हरी और हरी लहराती थी
नन्हीं कपोलों से फूटी थी
पेड़ो की टहनियों से जुड़ी थी
उन्हीं पर लहराती हुई 
जीवन का राग सुनाती थी
मन को बहुत लुभाती थी
वही हरी-हरी पत्तियाँ
कोमल व नाजुक सी पत्तियाँ
मौसम के सुख-दुख में
पेड़ों की शान बढ़ाती पत्तियाँ
जब सूखने लगती है
तब सिकुड़ती है
तो पीली पड़ जाती है
तब वे पेड़ों से बिछुड़ती है
हवा में फड़फड़ाती है
फिर बेबस धरा पर गिरकर
खामोश सी पसर जाती है
फिर
वही हरी पत्तियाँ
पीली पड़ जाने के बाद की पत्तियाँ
हवा के निष्ठुर झोंकों से
जमीन पर ही फड़फड़ाती है
तब जिन्हें हम रौंदते है
फिर जिन्हें हम इकट्ठा भी करते है
फिर हम जिन्हें जलाते भी है
तब
वही सूखी पत्तियाँ
मौसम के बदलाव से जुझती पत्तियाँ
हमें जीवन का मर्म समझाती है
अपने जीवन का अक्स दिखलाती है
आगे बढ़ते रहने का पाठ पढ़ाती है
फिर खुशी-खुशी धरा में विलीन होकर
विलुप्त होने की सत्यता समझाती है।
 

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