अदृश्य कोरोना (कविता)

एक अदृश्य दुश्मन कोरोना,
उत्पन्न हो गया है आज।
घात लगाकर छुपा बैठा है,
देखो चारों ओर।
घेर लिया है पूरे विश्व को,
अपने चंगुल के जाल में।
विवस और बेबस करके,
पांव पसार रहा है चंहु ओर।
करके बीमार एक-एक को,
आगे बढ़ने को आतुर है।
बना रहा है जंजीर ये,
एक दूसरे के संपर्क में आने पर।
सोच रहा है घेर लें सबको,
जकड़कर अपने जाल में।
पर हम भी चालाक कम नहीं है,
उससे लड़ने को है तैयार।
मास्क लगा लिए चेहरे पर,
कोरोना से छुटकारा पाने को।
एक दूसरे से दूरी भी बनाकर,
रह रहें है हम सबके साथ।
ताकि तोड़कर उसकी श्रृंखला,
कर देंगे उसको निष्क्रिय व असहाय।
पैर पसार नहीं पायेगा, वो जग में,
लुप्त हो जायेगा, होकर निरीह।
आयेगी खुशहाली जग में चारों ओर,
यही प्रार्थना है ईश्वर शक्तिमान से।

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