शराब की दुकान पर लाॅकडाउन क्यों नहीं (व्यंग्य )

सोमवार को मेरे व्रत का दिन था। कामवाली कमला के इंतजार में बैठी थी कि वह आये, तब मैं अपना काम शुरु करु। पर वह नहीं आई, तो नहीं ही आई। 

दूसरे दिन सुबह लुटी-पिटी सी वह आई और आते ही बोलना और रोना शुरु कर दी। बोली," आंटी, सरकार ने सबसे पहले शराब की दुकान ही खोल दिया। अरे, पहले सरकार हमारे पेट के लिए हमारे घर के चूल्हा जलने का इंतजाम करती अर्थात काम-धन्धा शुरू करवाती तब हम उसे सही काम करने वाली सरकार मानते भी, पर उसने वह काम तो पहले किया नहीं, बदले में हमारे घर में आग लगाने पर जुट गयी है। जो बेरोजगार पति चालीस दिन से खामोश घर में बैठे थे, काम में हमारा हाथ बँटाकर सबका सहयोग करते थे, वहीं पति अब शराब के पैसों के लिए और साथ ही अन्य ऊलजलूल मुद्दों को लेकर लड़ने-झगड़ने और हाथापाई पर जुट गए हैं। काम पर तो उन्हें जाना नहीं है, बदले में दिनभर उनके दूसरे रुप का नरक झेलो सो अलग से। हमारे यहाँ झोंपड़ी पर तो लोग जैसे जश्न मनाने लगे है। लाॅकडाउन के बंदिशों की धज्जियाँ ही जैसे उड़ गयी। लड़के भी बेरोजगार हो गये है। उनके काम-धन्धा के बारे में सोचना छोड़कर सरकार ने बहुत गलत और बेकार काम पहले शुरु कर दिया है। " 

 कमला ने अपने मन का गुबार निकाल लिया पर मैं चुप थी। जिस समाचार से मैं स्वयं उंधेर-बून में फँसी हुई मनन करने में जुटी थी उसके लिए कमला को क्या समझाती? सरकार के इस फैसले पर पहल करने का औचित्य ही क्या था? सरकार इतनी हड़बड़ाई हुई बेचैन क्यों हो गई? अभी तक कभी ऐसे ज्वलंत मुद्दों पर इस तरह सोचने का मौका ही नहीं मिला था। आज जब वैचारिक रुप से विचार करने बैठी, तब हकीकत समझ में सामने आया कि ये बेवड़े ही सरकार के अर्थ व्यवस्था के लौहस्तम्भ है। इनके बिना सरकार की अर्थव्यवस्था चरमरा रही थी, तभी तो सरकार ने इस काम की प्राथमिकता को समझकर इसे लाॅकडाउन जैसे विकट परिस्थितियों में भी प्रथम स्थान दिया है। सरकार ने अपने राजस्व के ललक मे शराब की दुकान खोलने जैसे अनैतिक कार्य को भी नैतिक बना दिया। लाॅकडाउन में सोसल डिस्टेंडिंग का महत्व सिखाने वाली सरकार अपना पेट भरने के लिये उसी लाॅकडाउन की धज्जियाँ, घरेलू हिंसा और आपराधिक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने वाला अनैतिक काम शराब की दुकान खुलवाकर कर दिया है जिसका वह स्वयं विरोध करती थी। जनता की कमजोरी को सरकार बखूबी समझती थी तभी तो उसकी इस कमी को भुनाने में सरकार ने बड़ी तत्परता दिखलायी। शराब के दुकान के आसपास भीड़ की ऐसी आपाधापी और अफरा-तफरी का मंजर देखने को मिला जैसे लाॅकडाउन पूरी तरह खुल चुका है। अपने लिए अपने स्वार्थ में सरकार ने जनता के हित को और कोरोना जैसे वैश्विक महामारी में सोशल डिस्टेंडिंग जैसे महत्वपूर्ण उस भूमिका को भूल गयी जिसका पाठ वह अभी तक जनता को रटवाती आ रही थी। इस वैश्विक महामारी के बचाव में अब तक अपने किए अपने मेहनत पर सरकार ने खुद ही पानी डाल दिया। शराब के अतिरिक्त राजस्व वसुलने का और भी नायाब तरीका था, जो सरकार अपना कर अपने घाटा को पूरा कर  सकती थी और जनता को इस नरक से बचा सकती थी। अभी वक्त है सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए, वरना कमला जैसी तमाम भारतीय नारियाँ सरकार को रोती-कलपती और कोसती हुई मिलेंगी। 

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