सुख की पहचान (लघुकथा)

घर में दो बहुएं थी। बड़ी बहु शिखा नौकरी करती थी। वह सुबह काम पर निकल जाती तो शाम को ही वापस लौटती। थके हारे होने के वाबजूद भी उसे घर के कामों में हाथ लगाना पड़ता था। छुट्टी के दिन ही वह पति के साथ घर के बाहर जाकर मौज-मस्ती करती।
पर छोटी बहु राखी घर में ही रहकर घर के कामों में जुटी रहती, दिन में आराम करती और कालोनी की हम उम्र युवतियों संग मजे भी कर लेती। दोनों के जीवन शैली अलग-अलग थी। पर अपने उन्हीं तरीकों में दोनों अपने अपने तरीका से जीवनयापन में व्यस्त थी।
समय बीतता गया। पर शिखा के मन में अचानक विकार उत्पन्न होने लगा कि वह घर और बाहर के कामों में व्यस्त रहकर जिंदगी का मजा और सुकून वह वैसी नहीं ले पाती है, जो राखी घर बैठकर लेती है। तुलनात्मक अध्ययन में वह अपने को कम आंकने लगी। और परेशान होकर उलझनों में फँसने लगी।
अचानक एकदिन वह अपने मन का गुबार सासू माँ अल्पना के सामने खोलती हुई बोली," मम्मी जी, मैं दिन-रात मेहनत करके वह खुशी व सुकून तलाश नहीं पाती हूँ, जो मुझे राखी में देखने को मिलता है। वह घर के कामों को निबटाकर बिंदास मस्ती मारती रहती है। ऐसे में मेरे दिनभर खटनें का क्या मतलब है? मुझे तो घर वाली जिंदगी ज्यादा अच्छा लगने लगा है।"
यह सुनकर सासू माँ बोली, "बेटी, ये तुम्हारे सोचने का तरीका है। खुशी किसी की अपनी निजी धरोहर नहीं होती है। यह महसूस करने पर मिलती है। वरना राखी भी तुलनात्मक रुप से सोच सकती है कि वह दिनभर घर के कामों में खटती है। जबकि घर में बहुत काम होता है। और गाढ़े-बेगाढ़े उसे जिम्मेदारी से निभाना भी पड़ता है। तुम आजाद परिंदे की भांति अपने समय पर घर से निकल जाती हो, जबकि घर में बहुत से काम करने को बचा होता है, पर मौजूद न होने के कारण तुम उनसे स्वतंत्र भी रहती हो। तुम अपने तरीका से दिल खोलकर अपने पर खर्च करती हो, जबकि वह पति की इच्छा पर निर्भर रहती है। इस प्रकार वह भी तुमसे तुलना करके दुखी हो सकती है। तुम अपनी इच्छा से नौकरी करती हो और वह अपनी या पति के इच्छा से बाहर नहीं निकली, इसलिए अपने ढ़ंग से मिले जीवन का सुख भोगो। कोई पूर्णता में नहीं होता, इसलिए दुखी होने की जरूरत नहीं है। अपने हिस्से में मिले जीवन का सुख भोगो और संतुष्ट रहो। "
सासू माँ से मन की बाते करके शिखा को बहुत राहत मिली। उसने तुलना करना छोड़ दिया और अपनी मिली जिंदगी का सुख भोगने लगी।

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शंखनाद (कविता)