अनजान यात्री (संस्मरण)

मेरा बेटा सुधांशू टी.एस.चाणक्या मुम्बई में मरचेंट नेवी की पढ़ाई कर रहा था। वहाँ उसकी मलेरिया के कारण तबीयत खराब हो गई। 10-15 दिन झेलने के बाद जब ठीक होने का आसार नजर नहीं आया, तब उसने अपने दोस्त से फोन करवाया कि तबीयत ठीक नहीं हो रही है अतः पापा आकर उसे घर ले जायें।
पति के साथ मैं भी मुम्बई के लिए प्रस्थान कर गई। जाने का रिजर्वेशन मिल गया, पर लौटने का रिजर्वेशन इसलिए नहीं कराया कि पता नहीं वहाँ की स्थिति क्या हो? 
सुबह मुम्बई पँहुच कर हम लोग सीधे हॉस्टल गये। बेटा को लेकर वँहा रुकने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि उसे जितनी जल्दी घर का माहौल मिले यह आवश्यक हो गया। अतः हॉस्टल की औपचारिकताएं पूरी करके हम लोग बाहर आ गये।
  हमारी वापसी की ट्रेन रात में ही थी। कहीं और रुकने की अपेक्षा हम स्टेशन ही पँहुचकर टिकट ले लिये। ट्रेन आने पर हम लोग टीटी से बात करने के उपरांत  एक डिब्बे के साइड बर्थ पर बैठ गये। काफी देर बाद टीटी ने एक बर्थ दे दिया। उस अपर बर्थ पर बेटा को लिटाकर हम उसकी तरफ से निश्चिंत हो गए।पर हमें अपने बर्थ की चिंता थी कि इस बर्थ का रिजर्वेशन कराने वाला आ गया तो हमारी आगे की यात्रा कैसे पूरी होगी? 
लेकिन बर्थ का रिजर्वेशन कर्ता एक युवा वर्ग का लड़का आया तो हम उठकर दूसरी सीट देखने लगे, तब वह बोला," आप लोग बैठे रहिये। हम भी बैठकर यात्रा कर लेंगे।" मेरे पति बेटा के बर्थ पर अपने को एडजस्ट कर लिए। 
इसके बाद हम लोगों को दूसरे बर्थ की जरुरत ही नहीं पड़ी। 
एक सुलझे और सरल स्वभाव के सहयात्री, जिसका पूरे बर्थ पर एकाधिकार था, उसका सिमट कर अधलेटे और बैठे हुए यात्रा करना और सुलझी हुई बातें दिल को छू गयी।
मैं आज भी उस अनजान सहयात्री की तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ जिसके वजह से लम्बी और कष्टकारी यात्रा सुकून भरी सुखद एहसास वाली हो गयी।

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