नन्हा बच्चा (बाल कविता)

जब मैं नन्हां- सा बच्चा था,
रो-रोकर करता, माँ को बेहाल।
तब माँ मुझे गोदी में उठाकर,
बाहों का झूला झुलाती थी।
डोलाती थी, बहलाती थी, 
फिर कन्धें पर ले टहलाती थी।  
धीरे-धीरे गुनगुन की लय से,
वह लोरी गाकर सुनाती थी।
हल्की-हल्की थपकी पाकर,
आँखें मेरी मूंद जाती थी।
सोया जानकर माँ, मुझको,
बिस्तर पर जाकर लिटाती थी।
मैं भी था माँ का नटखट बच्चा,
माँ, मेरी चाल समझ न पाती थी।
मैं झटके से आँखे बंद किए ही,
माँ, के आँचल को पकड़ता था।
रीझकर कहती है माँ, शैतान है बच्चा,
बिलकुल पापा जैसा चालू है।
मस्ती की लय में एक आँख से,
निहारकर, जब उन्हें चिढाता था।
झट से चूमकर मुझको, गालों पर,
झप्पी वाली चपत लगाती थी।
फिर मेरे पास ही लेटकर मुझको,
मेरे बालों व गालों को सहलाती थी।
ममता की गहरी छांव में लेकर ,
पूरी निष्ठा से मुझे दुलराती थी।
फिर मेरी चंचल व चालू आँखें, 
चुपचाप बोझिल हो जाती थी।
तब मैं गहरी नींद में आकर,
बेझिझक चैन से सो जाता था।           

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