पापा की तल्ख नजरें (संस्मरण)

कभी-कभी माँ-बाप के प्यार और दुलार से ज्यादा उनकी मार और फटकार उद्वेलित करता है और यादगार बन जाती है।हाई स्कूल में गणित प्रथम का पेपर खराब हो गया तो मैं पापा की तल्ख नजरों से बचती फिर रही थी क्योंकि उनके डांट का खौफ मन में समाया हुआ था। पापा पेपर माँगते तो मैं उन्हें गच्चा देकर छुपती रही। पकड़ी गई तो टालमटोल जवाब देकर बोली," आज का खराब हो गया है। लेकिन कल का पेपर अच्छा होगा।" काम में व्यस्त पापा काम पर चले गये।
दूसरे दिन लंच के समय  पापा तहसील से आये और मुझे बुलाये। मैंने कहा," सारे सवाल सही है।" पापा आज मुझे छोड़ने के पक्ष में नहीं थे। वे जोर से बोले," कापी और पेपर लेकर आओ।" 
मैं कापी पेपर लेकर पँहुची तो बोले,"कैसे हल किया है? हल करके बताओ।"
मैं हल करने लगी। पर अफसोस, पहले प्रश्न का पहला उत्तर ही गलत निकल गया। पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर पँहुच गया। वे गुस्से में मेरी कापी जमीन पर फेंककर तमतमाते हुए खाना खाने लगे। श्यामा दीदी आकर खड़ी हो गयी तो उन्हें भी डाटकर भगा दिए।
मैं जमीन पर बैठी, उंधेरबून में फँसी सोचती रही कि ये गलती कैसे और क्यों हो गया? खाना खाने के बाद पापा मुझे फिर बुलाये। बाकी सभी सवाल सही होने पर वे संतुष्ट हो गये, पर बोले कुछ नहीं, चुपचाप ऑफिस चले गये। पापा की खमोशी और उनके उम्मीदों पर खरी न उतरने का मलाल दिल को कचोटने और चुभने लगा, पर यही चुभन आगे का मार्ग प्रशस्त करने में संजीवनी की भूमिका अदा की और जीने की राह आसान कर दी।

1 comment:

Unknown said...

जायज है

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