क्रोध पर आग्रह भारी था (संस्मरण)

सब्जी खरीदने मैं पति के साथ अक्सर सब्जी बाजार जाती थी। 
ये सब्जी छांटकर लेते थे। और अक्सर शिकायत करते कि मैं सब्जी छांटने में इनकी मदद नहीं करती हूँ। पर मेरा अनुभव था कि मैं जब भी कोई सब्जी छांटती तो ये कुछ ना कुछ कमी निकालकर उसे वापस डलिया में डाल देते।मैं खिजने की वजह से इनका साथ दे नहीं पाती थी। और यही कारण था कि मैं अपनी पसंद भूलने लगी थी।
एकदिन एक छोटा लड़का एक लौकी दिखाकर बोला," आंटी, लौकी ले लीजिए।" मैं उसके आग्रह को नकार नहीं सकी, खड़ी होकर लौकी देखने लगी। ये पीछे मुड़े और लौकी लेने को मना कर दिए। मैं आगे बढ़ी तो वह लड़का फिर आ टपका और जिद करने लगा। मैं ठिठक गई। ये पलटे और उसे डाटने लगे,"क्यों पीछे पड़े हो? भागो यहाँ से।"
मुझे इनका गुस्साना अच्छा नहीं लगा।  मैंने मन ही मन में मनन किया तो मुझे इनके क्रोध की अपेक्षा उसका आग्रह भारी लगा। मैं अड़कर लौकी खरीद ली। रास्ते भर इनका तमतमाया चेहरा देखने योग्य था।
घर आने पर मैं तल्ख स्वर में बोली,"इतनी छोटी बात पर इतना गुस्सा।क्या आपकी नजर में मेरी  इच्छा का कोई मोल नहीं?"
उस दिन मेरी नाराजगी पर ये शांत स्वर में बोले," नहीं, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। मुझे तो बस उसके जिद पर गुस्सा आ गया।"
इस घटना से एक दूसरे की भावनाओं की इज्जत करने की नींव जो उस दिन पड़ी, उस पर हम आज भी टिके हुए है।

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शंखनाद (कविता)