लाजवंती सी छुईमुई (लघुकथा)

स्पर्श मात्र से अपने पहलू में सिमट जाने वाली लाजवंती छुईमुई के पौधें...कुदरत की अनोखी करिश्मा है या हमारे मनोरंजन का मनमोहक साधन? अभी यह अनबुझ पहेली मैं समझ नहीं पायी थी...पर इसके बारे में इतना जरूर जानती और अनुभव की थी कि इसे छूने मात्र से जो स्किंध मुस्कान मेरे और लोगों के चेहरे पर छा जाती है उसे स्वयं में अनुभव करना या लोगों के चेहरे पर देखना ही अति आनंदित करने वाला सुखद अनुभूति था।
यही कारण था कि अति आनन्दित करने वाले इस सुखदायी पौधा को मैंने अपने मकान के बाहर गेट के एक तरफ के एक क्यारी में पनाह दे दी। माली के सहयोग से  छुईमुई के पौधें से मेरा क्यारी में भर गया।
अब मुझे इस क्यारी के कारण दुगनी खुशी मिलने लगी थी क्योंकि यह मेरे साथ ही साथ बच्चों और लोगों के भी मनोरंजन का साधन बन गया था। लोग इसके पास आते,  छूते और छूकर चले जाते।
बच्चे इसके समीप आना और छूना चाहते थे पर शायद उनके मन में मेरा भय समाया होता था। इसीलिए जब भी  आते तब उनकी चोर नजरें मुझको ढ़ूढ़ती थी। मैं उनके दुविधा को समझती थी, इसलिए जब भी बच्चों को देखती तो देखकर भी उन्हें नजरअंदाज कर देती। तब मुझे न पाकर उनके बढ़ते कदम अपने आप छुईमुई पौधों के पास पँहुच जाता...और वे सबकी नजरों को बचाकर छुईमुई की पत्तियों को छूने का क्षणिक आनन्द लेते और छूकर भाग जाते। ऐसा करने में उन्हें बहुत मजा मिलता था।
मैं भी आते जाते छुईमुई की पत्तियों को छूना नहीं भूलती थी, जो मेरे जरा सा स्पर्श होने मात्र से ही अपने बिखरे पत्तों को समेटकर लाजवंती सी शरमाकर अपने में सिमट जाती थी। मुझे इतने से संतुष्टि नहीं मिलती थी इसलिए मेरे कदम आगे बढ़ते नहीं थे बल्कि वहीं ठिठकते हुए जम से जाते थे। और तब तक वहीँ जमें रहते जब तक कि पौधों की  पत्तियों अपने आप फैलकर खुल नहीं जाती थी। 
एकदिन एक छोटे बच्चे को आखिर छुईमुई के पौधे से खेलते हुए मैंने पकड़ ही लिया। मैं बाजार से लौट रही थी। अपनी गली में मुड़ते ही मुझे सौराष्ट्र नामक वह छोटा बच्चा मिल ही गया जो अक्सर मेरे क्यारी के पास खड़ा दिखता था। वह पूरी तन्मयता से छुईमुई के पौधे से खेल रहा था। मैं चुपचाप सौराष्ट्र तक पँहुचने में सफल हो गयी। वह मुझे देखकर चिहुंक गया। फिर भागने की असफल कोशिश के लिए उठ खड़ा हुआ। मैंने उसे रोककर उससे प्रेम पूर्वक प्रश्न पूछा," बेटा, इन पत्तियों को छूने से तुम्हें क्या मिलता है?"
"आंटी, बहुत खुशी मिलती है।" सौराष्ट्र ने जवाब दिया।
मैंने उससे आगे बातें करते हुए पूछा," कैसी खुशी मिलती है, बेटा?"
आज सौराष्ट्र के चेहरे पर डर या झिझक नहीं था। वह सरलता से अपनी बात समझाने के लिए बोला," देखिए ना आंटी...मेरे छूने मात्र से ही ये पत्तियाँ सिकुड़कर सिमट जरूर जाती है पर मुरझाती नहीं है। फिर थोड़ी देर बाद ही ये धीरे-धीरे फैलने लगती है। फिर पूरी तरह फैलकर हँसने-मुस्कुराने लगती है।"
"ओह, तो ये बात है। क्या यह तुम्हारे मनोरंजन का अच्छा साधन है? तुम्हें इसे छूने से मजा मिलता है इसलिए तुम आते जाते इन्हें छूते हो। मैं तुम्हें ऐसा करते हुए कई बार देख चुकी हूँ।" मैं सौराष्ट्र के जवाब के प्रतिउत्तर में फिर प्रश्न कर बैठी। 
मेरे इतना कहते ही सौराष्ट्र उत्साहित होकर बोला,"सिर्फ यहीं बात नहीं है, आंटी, मुझे तो इससे बहुत कुछ सीखने को भी मिला है।"
मैं आश्चर्य से बोली ,"तुम्हें इस पौधे से क्या सीखने को मिला है? जरा मुझे भी तो समझाओ।"
सौराष्ट्र बोला,"एकदिन माँ ने मुझे मेरी किसी शैतानी पर बहुत मारा था। मार के कारण मैं गुस्से से भरा हुआ घर से निकल आया और आकर इसी क्यारी के पास बैठकर रोता रहा। उस समय घर न जाने के लिए मन बना लिया था और दुखी मन से छुईमुई की पत्तियों को छू रहा था। पत्तियाँ सिकुड़ती रही और मैं उन्हें निहारता रहा। थोड़ी देर बाद अचानक पत्तियाँ जब अपने आप फैलने लगी तो मेरे चेहरे पर भी धीरे-धीरे मुस्कान फैलने लगी। मैंने सोचा कि मैंने भी तो इन पत्तियों को मारा है। मार खाकर ये भी तो नाराज होकर सिकुड़ गयी थी। पर ये तो थोड़ी ही देर बाद स्वयं ही फैलने लगी। इन्हें किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ी? तो मैं क्यों किसी और से सहारे की उम्मीद करु? घर ही सबसे सुरक्षित जगह है। फिर मन में विचार आया कि मैं यहाँ क्यों रुठा हुआ बैठा हूँ?  माँ ने मुझे मेरी गलती पर ही तो मारा है। यह विचार आते ही मैंने अपने आँसू पोछे और घर जाकर माँ से माफी मांग लिया। तब से ये पत्तियाँ मुझे और अच्छी लगने लगी। आँटी, आप मुझे माफ कर दीजिएगा। मैं आपकी अनुमति के बिना इन पत्तियों को छुता रहा हूँ।"
सौराष्ट्र की बातें मेरे दिल को छू गयी। मैं बोली ,"शाबाश बेटा, तुमने बहुत गहरी बात बताई है। तुम बेझिझक इन पत्तियों से खेल सकते हो। और तुम्हें माफी माँगने की भी कोई जरूरत नहीं है।"
यह कहकर मैं ताला खोलने लगी ।
तभी सौराष्ट्र फिर बोला," आंटी, अब मैं शैतानी कम करता हूँ। फिर भी यदि माँ मुझे कभी मारती है तो मैं दुखी होकर ज्यादा देर रोता नहीं हूँ बल्कि जल्दी ही चुप होकर दूसरा काम करने लगता हूँ जिससे माँ की मार को जल्दी ही भूल जाता हूँ जैसे छुईमुई अपने मार पर सिकुड़ती है फिर जल्दी ही फैल भी जाती है।"
"शाबाश मेरे बच्चे । तुम बहुत प्यारे व समझदार हो। आज से तुम मेरे अच्छे दोस्त भी बन गये हो। अब हम खूब बातें भी किया करेंगें। तुम रुको, मैं अभी आती हूँ।" यह कहकर मैं अंदर आ गई। 
छुईमुई को छूने से सुखद अनुभूति मुझे पहले से ही मिलती  थी पर छुईमुई को नये अंदाज से देखने का नजरिया जब एक छोटे बच्चे ने मुझे सिखाया तो मुझे खुशी के साथ ही साथ जीने का नया उत्साह व उद्देश्य भी मिला। 
इस सीख का आधार यही है कि...बाहरी आघात मिलने पर छुईमुई की पत्तियाँ कुछ पल के लिए सिमट व सिकुड़ जाती है पर हमेशा के लिए निराश व दुखी नहीं होती बल्कि नये जोश, उमंग व उत्साह से फिर खुलकर जीवंत हो उठती है और हँसने, मुस्कुराने और चहकने लगती है। वैसे ही अब मैं भी नकारात्मक सोच और दुखद पल को अपने पास ज्यादा फटकने नहीं देती हूँ बल्कि छुईमुई की तरह फिर फैलकर जीवंत हो जाती हूँ।

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शंखनाद (कविता)