जीवन की दूसरी पाली (लघुकथा)

रिटायरमेंट के दूसरे ही दिन अपने खाली हुए मन-मस्तिष्क के पिंजरे को खट्टी-मीठी यादों की अनुभूति से भरने के लिए मैं उसी रेस्टोरेंट में जा बैठा, जहाँ नौकरी के समय काम से बोझिल मन-मस्तिष्क को दो पल का सुकून देने के लिए  सहयोगियों के साथ लंच में जाकर बैठता था। उस अल्प समय में भी चाय-पकौड़े के बीच कहकहों और ठहाकों का जो दौर चलता था, वह सुकून व शान्ति से लबरेज करने वाली होती थी। बोझिल मन शांत व तनाव मुक्त हो जाता था जिसके कारण मन प्रफुल्लित होकर नई स्फूर्ति का संवरण कर लेता था, जिससे  लंच के बाद की दूसरी पारी के लिए हम नये उत्साह और लगन से फिर से काम में जुट जाते थे।
आज एक ही दिन में सब कुछ कितना बदला हुआ लग रहा है। रेस्टोरेंट वही है..चाय-पकौड़े, कहकहे और ठहाके का मंजर वही है... पर फिर भी  मैं कितना रिक्त व खोखला होकर अकेला बैठा हूँ....।
मन में दहशत का बुलबुला बन और फूट रहा था। जिंदगी के दूसरेे खाली पाली के समय को कैसे बिताऊंगा? अनेको प्रश्न मन में गुलाटियाँ मार रही थी।
   उसी समय मन अंगुलियों की सरसराहट से काँप उठा तो देखा नन्हां पोता अपने पापा के साथ खड़ा होकर  मेरे हाथ को खींच रहा था। वह मुझे देखकर हँसा और फिर मुस्कुराते हुए बोला,"दादा जी, अब आपका ऑफिस जाने का कोई बहाना काम नहीं आयेगा। चलिए, अब आप भी खाली..मैं भी खाली। अब हम धूम-धड़ाका करते हुए  मौज-मस्ती करेंगें और खूब खेलेंगें।"
बुझे मन और थके पैरों में जैसे जान आ गयी। इस नयी पाली की तरफ से ध्यान क्यों भटक गया था...अरे, मैं तो भूल ही गया था कि अब तो यही मेरे ऑफिस और रेस्टोरेंट से मिलने वाली बोझिल और कहकहों की खट्टी-मीठी गोली है...जिसके रसास्वादन से मेरे बाकी जीवन की नैया हिचकोले लेते हुए मस्ती से आगे बढ़ने वाली है...। 
मैं प्रफुल्ल मन से पोता की अंगुली पकड़कर उठ खड़ा हुआ और जल्दी - जल्दी घर की ओर बढ़ने लगा। 


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