सबसे अच्छी दोस्त की दोस्ती (बाल कहानी)

फ्रेंडशिप डे आने वाला था। कंचनवन के सभी पशु-पक्षी इस पर्व की तैयारी में गुपचुप तरीके से जुटे हुए थे। पर कोई एक दूसरे को यह बताने को तैयार नहीं था कि वे करने क्या जा रहे है? और अपना उपहार वे किसे देने वाले है।
मिंकू चुहिया को गब्बू खरगोश बहुत अच्छा लगता था। वह कामता सेठ की दुकान से ढ़ेर सारा अनाज इकट्ठा किए हुए थी। अतः वह इन्हीं अनाजों को रंगीन करके वह एक कागज पर चिपका कर ग्रीटिंग तैयार कर रही थी।
उसी दिन मिंकू की दोस्त गेटू गिलहरी अचानक मिंकू के घर पहुँच गई। उस समय मिंकू ग्रीटिंग बनाने में व्यस्त थी। अचानक गेटू के आने पर वह चौंक गयी, पर वह अपना ग्रीटिंग कार्ड छुपा नहीं पाई। गेटू बोली," मिंकू, तुम्हारा कार्ड बहुत सुंदर बन रहा है। इतना सुंदर कार्ड तुम किसके लिए बना रही हो?" 
मिंकू बोली,"यह भी कोई बताने वाली चीज है। जो मुझे सबसे ज्यादा प्रिय होगा, मैं यह कार्ड उसी को दुंगी।"
"तुम्हें सबसे ज्यादा प्रिय कौन है? मैं तुम्हारी सबसे प्रिय दोस्त हूँ। क्या तुम मुझे इतनी सी बात भी बता नहीं सकती हो?" गेटू मिंकू को कुदेरती हुई बोली।
"दोस्त, यह सीक्रेट बात होती है। फिर भी मैं यह बात तुमको बता रही हूँ। मैं यह कार्ड गब्बू खरगोश के लिए बना रही हूँ। क्योंकि वह मुझे बहुत अच्छा लगता है। तुम बैठो। मैं तुम्हें गरमा गरम गाजर का हलवा अभी खिलाती हूँ। बहुत मजा आयेगा।" मिंकू खुश होकर बोली।
"मुझे अपना होमवर्क पूरा करना है। मैं रुक नहीं सकती। जल्दी है,वरना हलुवा खा लेती।" यह कहकर गेटू झटपट मिंकू के बिल से निकल गई।
गेटू गुस्से से लाल-पीली होती हुई भागी जा रही थी। क्योंकि वह मिंकू की पक्की दोस्त थी। उसे उम्मीद था कि मिंकू उसका नाम लेगी पर मिंकू के मुख से गब्बू का नाम सुनकर वह दुखी हो गयी और मिंकू से नाराज भी हो गयी। ठीक उसी समय बल्लों बिल्ली उसका रास्ता रोककर बोली,"अरे गेटू , अकेले क्यों भागे जा रही हो। तुम्हारी दोस्त मिंकू नहीं नजर आ रही है।"
"मैं किसी मिंकू-विंकू को नहीं जानती। वह हमारी दोस्त नहीं है। तुम मेरा रास्ता छोड़ो और मुझे जाने दो।" यह कहकर गेटू वहाँ से सरपट भाग गई।
बल्लों यह सुनकर काफी खुश हो गई। उसे मिंकू को पकड़ने का रास्ता अब बिलकुल आसान नजर आने लगा था। क्योंकि वह  गेटू और मिंकू की दोस्ती के कारण मिंकू को पकड़ नहीं पाती थी। इन दोनों की दोस्ती उसे शूल की भांति चुभती थी। बार बार अपने हार के कारण वह सदैव इन दोनों की दोस्ती तुड़वाने के चक्कर में रहती थी। पर दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि वे इस दोस्ती को तोड़ नहीं पाती थी। पर आज उसकी इच्छा अपने आप बिना मेहनत के पूरा हो गई। बल्लों खुशी-खुशी गुनगुनाते हुए आगे बढ़ गयी।
कार्ड बनाकर मिंकू अपने बिल से बाहर निकली तो उसे गेटू नहीं दिखी।
बल्लों घुमती-फिरती हुई मिंकू के बिल के पास घात लगाकर मिंकू की इंतजारी कर रही थी। मिंकू को देखकर वह मिंकू के पीछे दौड़ पड़ी। अब मिंकू को गेटू की कमी खलने लगी। वह गेटू को आवाज देती हुई झटपट गेटू के घर में जा छुपी। गेटू उसे वहाँ नहीं मिली। पर गेटू का खोह उसके बचने के लिए आश्रयशाला बन गयी। 'ओह, लाख- लाख शुक्रिया जो गेटू का घर सामने था। वरना आज तो मैं बल्लों के चक्कर में फँस ही जाती।' मिंकू बड़बड़ाती हुई खोह में आराम करने लगी।
गेटू के बिना मिंकू को गेटू के बिल से निकलने में डर लगने लगा। गेटू उसके लिए ढ़ाल का काम करती। आज गेटू के न रहने पर मिंकू अपने को कमजोर समझने लगी थी। उसे बल्लों  से बहुत ज्यादा डर लगने लगा। वह बिल से बाहर सर निकालती फिर बल्लों के छुपकर बैठे होने की आशंका में गेटू के खोह में घुस जाती।
गेटू और मिंकू हमेशा साथ-साथ खेलते थे। गेटू मिंकू को बिल्लों से न डरने का सलाह देती और उसमें हिम्मत का संचार करती। जिसके कारण उसमें बल्लों के सामने से गुजरने की हिम्मत आ जाती और वह बल्लों के सामने से बेहिचक दौड़कर गुजर भी जाती थी। मिंकू सोचने लगी कि गेटू का उसके जिंदगी में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसे वह गेटू के हमेशा साथ रहने पर समझ नहीं पायी। मिंकू गेटू के खोह से बाहर नहीं निकली। वह गेटू की इंतजारी करती हुई वहीं सो गयी।
गेटू अपने खोह में वापस आई तो मिंकू को सोते हुए देखकर घबड़ा गई। उसने मिंकू को सोने ही दिया और चादर लेकर वह भी मिंकू के बगल में सो गई।
सुबह नींद खुलने पर गेटू को बगल में सोती हुई जानकर मिंकू बहुत खुश हुई। गेटू के उठने पर मिंकू बोली," गेटू, मेरी दोस्त, तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गई थी? देखो, तुम्हारे बिना मेरी क्या हालत हो गई है? मैं कितनी डरपोक हो गई हूँ? मुझे छोड़कर कहीं जाया नहीं करो।"
गेटू चाय बनाकर लायी और बोली,"लो चाय पीओ। तुम मेरी अच्छी दोस्त हो। मैं तुम्हें छोड़कर कहीं जाने वाली नहीं हूँ।"
चाय पीने के बाद दोनों सहेलियाँ निर्भीक विचरण करने लगी। बल्लों ने जब दोनों को साथ देखा तो वह अपना सर पकड़कर बैठ गई। वह अचम्भित होकर सोचने लगी,' इनमें इतनी जल्दी दोस्ती कैसे हो गई? मिंकू अकेली थी तब वह उसे पकड़ सकती थी परंतु अब तो उसे पकड़ना नामुमकिन ही था। अब मिंकू का चक्कर लगाना बेकार है।' हताश बल्लों मिंकू को पकड़ने की अभिलाषा छोड़कर दूसरी जगह चली गई।
मिंकू को घुमते-टहलते हुए जब बल्लों नहीं दिखी तब वह समझ गई कि सबसे अच्छी होती है दोस्त की दोस्ती। दोस्ती में बहुत बड़ा बल होता है। उससे आत्मनिर्भिरता में बृद्धि होती है। गेटू के रहते बल्लों उसे नुकसान नहीं पहुँचा सकती थी।
मिंकू ने अपना ग्रिटिंग कार्ड बहुत सुंदर तरीका से पूरा किया और फ्रेंडशिप डे के दिन वह अपना उपहार ग्रिटिंग कार्ड जब गेटू के पास जाकर गेटू को दी। तो बोली," तुम यह कार्ड गब्बू खरगोश के लिए बनायी थी, तो फिर मुझे क्यों दे रही हो?"
मिंकू बोली," अच्छा लगने से कुछ नहीं होता। गब्बू मुझे अच्छा लगता है पर मेरी प्रिय दोस्त तुम ही हो। आज का उपहार अपने सबसे पक्के व प्रिय साथी को दिया जाता है।  इसलिए मेरा यह प्रिय उपहार फ्रेंडशिप डे के उपलक्ष्य में तुम्हारे लिए ही है।"
"ओह, मैं तो यह सोचकर दुखी थी कि गब्बू के सामने मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं हूँ। पर आज मैं बहुत खुश हूँ। मैं भी तुम्हारे लिए यह गुलदस्ता बनायी हूँ। इसे स्वीकार करो, मेरी दोस्त।" गेटू का गुलदस्ता लेकर मिंकू भी बहुत खुश हुई।
फ्रेंडशिप डे की खुशियाँ मनाने के बाद गेटू बोली," मिंकू, मेरे पास एक और उपहार है। गब्बू खरगोश मुझे भी बहुत अच्छा लगता है। चलो हम आज उसे उपहार देकर उसे भी अपना दोस्त बना लें।"
यह सुनकर मिंकू बोली," दोस्त, तुम्हारा सुझाव बहुत सुंदर है। चलो, हम गब्बू को भी अपना दोस्त बनाते है। इससे हमें बहुत खुशी और मजा दोनों मिलेगी।" 
इसके बाद दोनों दोस्त उपहार लेकर गब्बू को देने के लिए बेखौफ कंचनवन में निकल पड़ी।

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शंखनाद (कविता)