मर्यादित बहू (लघुकथा)

रेनू के शादी के दस साल बाद परिवार में जिठानी के बेटी की शादी थी। शादी के दिन सुबह से ही शादी के सामान के साथ लोग मैरेज हाल पहुचँने लगे। सुबह के नाश्ता और दोपहर के खाने की व्यवस्था वहीं हाल में ही थी। 
रेनू और उनकी देवरानी सुमन को आने वाले  मेहमानों के स्वागत की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, ताकि सभी मेहमानों को उचित आदर-सत्कार मिल सकें। रेनू-सुमन उत्साह से लबरेज थी। वे एक ही तरह की साड़ी पहनकर तैयार होने लगी। तैयार होते समय रेनू सुमन से बोली,"हमारी शादी को काफी समय हो गया। अबकी बार हम सर पर पल्ला रक्खें बिना ही तैयार होंगे, आखिर हम कब तक इस परम्परा का निर्बाह करते रहेंगे?" 
सुमन बोली,"ठीक है, भाभी। हम ऐसे ही तैयार होते है।"
दोनों बहुओं में पटती थी इसलिए इस सोच के तहत दोनों बहूएं बिना सर पर पल्ला लिए ही मेहमानों के स्वागत को तैयार हो गई।
रेनू उत्साहित होकर शादी में आई अपनी बहन रागिनी से बोली,"दीदी, इस बार हमनें सर पर पल्ला नहीं लिया है, क्योंकि हम कब तक इस परम्परा को निबाहते। आखिर कुछ बदलाव तो हममें भी आना चाहिए, ताकि हम कुछ नयापन महसूस कर सकें।"
यह सुनकर रागिनी बोली,"तुम इस घर की बहू हो। इस पल्ले से ही तुम्हारी एक अलग पहचान बनती रही है। जिसके कारण तुम अभी तक अपने को मर्यादित बहू के रुप में सुशोभित करती आ रही हो। तुम इसे ऐसे मौके पर छोड़ दो। यह उचित नहीं है।"
रागिनी के सही सोच का असर रेनू पर यूं पड़ा कि वह झट से सर पर पल्ला ले ली। और सुमन को भी ऐसा ही करने को बोली।
मेहमान दोनों बहुओं के प्रेम, व्यवहार कुशलता और मेहमाननवाजी की तारीफ करते नजर आये।
अपने लोगों की प्रसंशा सुनकर रेनू को अपनी दीदी की दी गई सीख बहुत भली लगी। वह मन ही मन में दीदी को धन्यवाद दी जिन्होंने उसके गलत सोच को सही समय पर सही दिशा दिखाकर पनपने नहीं दिया। आखिर बड़ों की सीख का मान रखने से खुशी व संतुष्टि ही मिलती है।
             

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