राखी की डोर (कविता)

खेलते थे, कूदते थे,
साथ-साथ हम रहते थे।
लड़ते थे, झगड़ते थे,
एक ही थाली में खाते थे।

राखी बाँधा, स्नेह बढ़ा,
अटूट बन्धन का संचार हुआ।
पलते रहे, बढ़ते रहे,
भाई-बहन के सूत्र में बँधे रहे।

शादी हुई, मैं विदा हुई,
मैके की ड्योढ़ी छूट गई।
पति मिला, ससुराल बसा,
एक नया घर द्वार बना।
आभास हुआ, जिम्मेदारी बढ़ी,
नये रुप का पार्दुभाव हुआ।
बचपन की बातें, भूली-बिसरी यादें,
स्मृति पटल पर अमिट रही।

फिर राखी आई, त्यौहार आया,
अमूल्य बंधन की ज्योति जली।
विह्वल हुई, व्याकुल हुई,
स्नेह सुधारस की बरसात हुई।
थाल सजाया, दीप जलाया,
भींगी पलकों से याद किया।
भाई आया, बचपन की खुशियाँ लाया
राखी बाँधी, मैके की ड्योढ़ी से फिर जुड़ गई।

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