मुर्गे की बाँग (बाल कविता)

मुर्गा कुकड़ू कू बोल रहा है,
मन ही मन में सोच रहा है।
मैंनें जो बाँग लगायी है,
सूरज की नींद भगायी है।

देखों सूरज चमक रहा है,
अपनी छटा बिखेर रहा है।
धरती पर हुआ सबेरा है,
सबको काम पर लगाया है।

नयी स्फूर्ति, नया जोश है,
सबमें उमंग-उल्लास भरा है।
मुर्गा खुद पर अकड़ रहा है,
बाँग को शंखनाद समझ रहा है।

ये जग जो नींद से जागा है,
सब मेरी ही अद्भुत माया है।
धरा पर जगमग उजाला है,
मेरा कुकड़ू कूं निराला है।

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