परिवार (कविता)

जहाँ मिलता है, पूरा परिवार,
वहीं होता है, खुशियों का अम्बार।
वक्त के बयार में बहकर,
जब बिखर जाता है परिवार।
दूर-दूर छिटकें, मोतियों जैसा,
अलग-थलग पड़ जाते है, लोग।
तब अपने-अपने दायरे में बँधे हुए,
इधर-उधर बसने के बाद भी।
वे एकाकीपन को महसूस करते है,
फिर होते है बेताब, मिलने व जुड़ने को।
क्योंकि सने और गुथें हुए आपस में,
वे लुगदी होते है एक मिट्टी के।
वे भूलते नहीं है, अपनी सरजमीं को,
इसलिए अपनी सरजमीं पर।
जब वे मिलते है पल दो पल को,
तब छा जाता है, खुशनुमा माहौल।
डोर में बँधें और गुथें मालों जैसा,
तब वे सुंदर से सुंदरतम लगते है।
मुदित मन से हुलसित लगता है,
उनकी आत्मीयता भरी मधुर मुस्कान।

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