क से कबुतर (बाल कहानी)

रोहित अपने मम्मी-पापा और भैया मोहित के साथ दिल्ली आया। ट्रेन से उतरने के बाद वे सभी लोग प्लेटफार्म पर एक साथ खड़े हो गये।
अचानक छोटे रोहित के सर पर कुछ टपका तो रोहित का हाथ अपने आप सर पर पहुँच गया। वह चिल्लाया,"उई माँ ! देखो, मेरे सर पर क्या गिरा हैं?"
रोहित ने उपर देखा तो सबकी निगाहें एकाएक उपर उठ गई, जहाँ कबुतरों का एक जोड़ा बैठा गुटर गू करते हुए मस्ती मार रहा था। 
"अरे, उपर तो कबुतर बैठे है। इसी ने मेरे सिर को गंदा कर दिया है, शीट। माँ ! जल्दी से साफ कर दीजिए।" रोहित कबुतरों को उत्साहित होकर देखने लगा, देखते समय वह थोड़ी देर के लिए उस गंदगी को भूल गया जो उसके सर पर पड़ा था।
कुछ पल रुक कर रोहित फिर बोला,"माँ ! क से ककूतर ....इसी पहले वाक्य से शुरू हुई थी न मेरी पढ़ाई और अब जब मैें बड़ा हो गया हूँ तो आज इसी ककूतर ने यह गंदगी कर दी और वह भी मेरे उपर। माँ, आप जल्दी से साफ कर दीजिए यह गंदगी। मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।" 
"रुको बेटा, मैं पोछ देती हूँ।" रोहित की माँ नीलिमा शान्त स्वर में यह बोल कर रोहित का सर साफ करने लगी।
रोहित माँ से शिकायत भरे शब्दों में बोला "माँ, क्या इसे मेरे उपर ही गंदगी करना था?" 
नीलिमा रोहित के सर को साफ करके जब उसे पुचकारने लगी तब रोहित मुस्कुराते हुए बोला," माँ, पहले जब मैं कबुतर को ककूतर बोलता था ,उस समय आप मुस्कुराते हुए मुझे कबुतर बोलना सिखाती थी। तब मैं ककूतर बोल-बोल कर आपको कितना रिझाता और छेड़ता था?"
"हाँ बेटा, मैं भी उस समय बहुत आंन्दित होती थी। जब तुम बार बार अपनी किताब के तीनों कबुतरों के चित्र को देखते और मुझे गिनने को कहते। मैं गिनती...फिर तुम गिनते...फिर हम दोनों खुश होकर ताली बजाते हुए मजा लगाते और वेरी गुड-वेरी गुड कह कर हसँते और लोट-पोट होते।" नीलिमा अतीत के सुनहरे पल में डूब कर बोली।
"हाँ, माँ मुझे सब याद है।" रोहित उत्तेजित हो कर बोला।
"हाँ बेटा, मैं भी वह पल भूल नहीं सकती जब तुम पहली बार कबुतर का सही उच्चारण किए थे...तब कितना हँसे थे, जैसे बहुत बड़ा और अच्छा काम किया है तुमने।" नीलिमा हँसते हुए बोली।
"माँ ,ककूतर बोल कर मैं बहुत खुश होता था। तभी से मुझे कबुतरों से लगाव हो गया। पर इसी ककूतर ने मेरा कितना बुरा हाल कर दिया ।" रोहित एक बार फिर रुआसां होकर बोला।
रोहित के सर को पोछती हुई माँ...प्यार से दुलराते हुए बोली," अब तो तुम्हारा सर साफ हो चुका है। फिर तुम्हें क्या चिंता। एक बात और है...तुम्हारे ककूतर को क्या पता कि तुम नीचे खड़े हो। उसने तो अपना काम किया और फिर देखो,मस्ती से गुटर गू भी करने लगा। जरा एक बार फिर से उपर देखो। मजा आएगा।"
"सचमुच माँ, दोनों कितने प्यार से एक साथ बैठे हैं।" मोहित, माँ के समर्थन में बोला।
उसी समय रोहित के पापा आ गए ,बोले,"चलो, हमें मेट्रो से चलना है।"रोहित आगे बढ़ता हुआ सोच रहा था कि 'कबुतर' उसे पहले भी बहुत अच्छे और प्यारे लगते थे और आज भी लगते है।
मेट्रो से राजीव चौक पहुँच कर ये लोग ब्लू लाइन वाले द्वारिका जाने वाली ट्रेन में बैठ गए। मम्मी को सीट मिल गई। रोहित मम्मी के पास बैठ गया थोड़ी देर बाद अन्डरग्राउण्ड प्लेटफार्म से निकल कर  मेट्रो ट्रेन उपर आ गई तो बाहर का नजारा दिखने लगा। रोहित खिड़की से बाहर की चहल पहल देखने लगा। 
बाहर का नजारा दिलचस्प और रोमांचक था। बड़ी बड़ी बिल्डिंगों के नीचे गाड़ियों की लम्बी व धीरे धीरे सरकती भीड़ और कहीं तेज रफ्तार में दौड़ती भागती गाड़ियां  रोहित को उद्वेलित व उत्साहित कर रहा था।
मोती नगर, कीर्ति नगर व रमेश नगर के आस पास अचानक बिजली के तारों पर कबुतरों के बहुत बड़े झुंड को कतार में बैठा देख कर रोहित चिल्लायां," माँ, इतने सारे  कबुतर एक साथ।"
नीलिमा देखती या कुछ बोलती उससे पहले ही सारे कबुतर एक साथ भरभरा कर उड़ गए । यह दृश्य रोहित को अच्छा लगा। ट्रेन आगे बढ़ रही थी। आगे रोहित ने देखा कि बिजली के तार पर एक एक करके ढ़ेर सारे कबुतर इक्कट्ठा हो गए। कबुतरों की इतनी लम्बी कतार में बैठना रोहित को लगा कि यह पिछले सीन का छूटा हुआ भाग था जो अब पूरा हुआ है। उसने पहली बार एक साथ इतने ढ़ेर सारे कबुतर को देखा था। इसलिए उसे बहुत मजा आया।
उत्तम नगर वेस्ट आने पर ये लोग ट्रेन से उतर गए। चाचा के घर पहुँच कर रोहित सोचने लगा,' अभी तो वह कहीं घूमने गया भी नहीं और कबुतरों ने उसे इतना अच्छा मनपसंद और मनमोहक नजारा दिखा दिया।'
चाय की चुस्कियों के मध्य गपशप चल रहा था । उसी समय  उड़ता हुआ एक कबुतर ड्राइंग रुम की खिड़की पर आ कर बैठ गया। थोड़ी देर बाद दूसरा कबुतर भी आकर उसके बगल में बैठ गया। दोनों आपस में गुटर गू करने लगे। रोहित दोनों को देखने लगा। श्रुति उसे कबुतरों में रुचि लेते देख कर बोली," क्या देख रहे हो, रोहित? यहाँ तुम्हें ढ़ेर सारे कबुतर हर छत पर दिखेगें। आओ मैं तुम्हें  बाहर दिखाती हूँ।"
रोहित श्रुति के साथ बाहर आया तो देखा सामने छत पर कबुतर बैठे है। कुछ उड़ते है, कुछ उड़ कर फिर बैठते है। दो चार जोड़े एक दूसरे से गुटरगू करते भी दिखे। रोहित उन्हीं में मस्त हो गया।
श्रुति बोली," उपर सीढ़ी के पास वाली जगह में एक कबुतर ने दो-तीन अण्डा दिया है। हम लोग चुपके से देख आते है। आओ मैं तुम्हें भी दिखाती हूँ।"
"दीदी, कबुतर तो हमें देख कर डर जाएगा।" रोहित सीढ़ियाँ चढ़ते हुए बोला क्योंकि उसे कबुतर को छेड़ना अच्छा नहीं लग रहा था।
"हम धीरे से देख कर आ जाएगें। उसे छेड़ेगें नहीं।" श्रुति धीरे से बोली।
धीरे धीरे चढ़ने के बावजूद भी कबुतर को आहट लग गई, तो वह उड़ कर दिवार पर बैठ गया। अण्डा देख कर रोहित बोला," दीदी, इन अण्ड़ों से बच्चा निकलेगा, तब बहुत अच्छा लगेगा। लेकिन इस समय चलो, दीदी। कबुतर हमसे डर रहा है और मैं उसे डरता हुआ देख नहीं सकता।" रोहित का आग्रह सुन श्रुति बोली," हाँ हाँ चलो, वरना कबुतर अण्डे के पास आएगा नहीं।" इसके बाद दोनों हाथ पकड़ कर सीढ़ियां उतरने लगे।
सीढ़ियाँ उतरते समय श्रुति बोली," एक बात बताऊ तुम्हें। कबुतर कभी अपना घोंसला नहीं बनाते है। ये मकानों, या विभिन्न बिल्डिंगों के खिड़की या रोशनदानों जैसी स्थानों में अपना ठिकाना बनाते है। ये सीधे सादे अपने में मस्त रहने वाले पक्षी होते है इसलिए सफेद कबुतरों को शान्ति का प्रतीक मान कर इन्हें 'शान्ति दूत' की उपाधि मिली है।"
"अच्छा ही है। इनकी सादगी ने इन्हें एक नाम दे दिया। इनकी सादगी, स्वंच्छंद व स्वतन्त्र उड़ान और मस्ती भरी गुटर गू मुझे बेहद पसंद है। स्लेटी और सफेद दोनों कबुतर मेरे मन को बहुत भाते है।" 
रोहित की बातें सुनकर श्रुति बोली,"मैं घूमते समय तुम्हें ऐसी बहुत सी जगहें जरूर दिखाऊगीं, जहाँ कबुतरों का बहुत बड़ा झुंड दाना चुगते दिखेगें। वँहा बहुत से लोग ढ़ेर सारा दाना डाल जाते है। चलो अब आराम कर लो।"
रोहित अंदर नहीं गया। वह बालकनी में खड़ा कबुतरों के मस्ती भरे जिंदगी का लुत्फ उठाता रहा।
इसके बाद रोहित घुमते हुए ऐसे कई स्थानों पर गया जहाँ कबुतरों का झुंड दाना चुगते दिखे। वे दाना चुगते, साथी के साथ प्रेम से गुटर गू करके बातें करते। पर जरा सी भी आहट होती तो वे एक साथ फुर्र से उड़ जाते।
रोहित मुक्त भाव से उन्हें निहार रहा था तभी एक कुत्ता उनकी भीड़ में घुसा तो सारे कबुतर एक साथ उड़ गए। उड़ने के बाद जिसको जहाँ जगह मिला वहीं बैठ गया...कोई बिजली के तार पर तो कोई मकानों के मुंड़ेरों पर तो कोई खिड़की और रोशनदानों पर। थोड़ी देर बाद एक एक कबुतर फिर नीचे आ कर दाना चुगने लगे।
जहाँ कबुतर थे वँहा गंदगी भी बहुत थी। रोहित को अपने सिर पर गिरा बीट याद आ गया तब वह अपना सिर सहलाने लगा।
ऐसे ही एक स्थान पर जब रोहित मंत्रमुग्ध होकर कबुतरों को देख रहा था, तभी एक बिल्ली अचानक झपट्टा मार कर एक कबुतर को दबोच कर भाग गई। सारे कबुतर फरफरा कर उड़ गए। 
रोहित अचम्भित होकर बोला," उई माँ, इस बिल्ली ने ये क्या कर दिया?" रोहित वही खड़ा सकपका गया।
थोड़ी देर बाद सारे कबुतर धीरे धीरे फिर नीचे आने और दाना चुगने लगे। रोहित हैरान परेशान उस दुखी कबुतर को ढ़ूढ़ने लगा जिसका साथी उससे बिछुड़ चुका था, पर रोहित उस दुखी कबुतर को ढूँढ नहीं पाया।
रोहित को सदमा लगा। इतने सीधे- सरल स्वभाव वाले और स्वच्छंद उड़ान भरने वाले कबुतर...जो किसी के दुश्मन नहीं होते...ऐसे ही सिर्फ अपने में सदैव मस्त और व्यस्त रहने वाले कबुतरों....के दुश्मनों की भी कोई कमी नहीं है। वे भी सुकून व शान्ति से जी नहीं सकते। दुखी रोहित को नीलिमा की याद आई तो वह माँ के पास लौट आया।
रोहित की बातें सुन कर माँ बोली," बेटा, तुम्हें अपने प्यारे कबुतरों से सरल और स्वच्छंद जिंदगी जीने की सीख मिलती है अतः वैसी ही जिंदगी जीने का संकल्प लो और मस्त रहो।" नीलिमा की बातों का रोहित पर असर हुआ। वह उत्साहित हो कर बोला," हाँ माँ, आप ठीक कह रही है। मैं फिर जा रहा हूँ कबुतरों की उड़ान देखने।" 
यह कह कर रोहित माँ को बाय बोला और फिर नई उमंग व नए उत्साह के साथ वहाँ पहुँच गया जहाँ कबुतरों के झुंड में से कुछ कबुतर दाना चुग रहे थे, कुछ उड़ रहे थे, कुछ बैठ रहे थे, कुछ गुटर गू कर रहे थे और कुछ लम्बी स्वच्छंद उड़ान भरने में लीन थे।

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