सृजन (बेटी की बेटी) (कविता)

सृजन की पहली अनुभूति,
धड़की जब मेरी सांसों में,
नई कपोल के फूटने से,
जाग्रत हुई मेरी अभिलाषा।

खिली जब मेरी बगिया में,
एक नन्हीं सी प्यारी कली,
हर्षित सारा परिवार हुआ,
मन में उमंग अपार हुआ।

प्रेम से पुलकित हुई,
झंकार से झंकृत हुई,
मधुर मातृत्व के बंधन में,
जकड़ी जब मैं पहली बार।

छाई खुशियों की बहार,
बदल गया मेरा संसार,
सुंदर सलोने मुखड़े को,
चूमा जब मैंने पहली बार।

रिमझिम की पहली फुहार,
भिगो गई मेरे तन को,
सीने से लगाकर उसको,
मैं लहरों सी लहराई थी।

छुपाकर आँचल में अपने,
दुध पिलायी थी पहली बार,
तब मुखरित हुई  गीत से,
प्रज्वलित हुई थी  दीप से।

अंगुली पकड़ वह चलने लगी,
पलनें और बढ़ने लगी थी वह,
तब हवा के तेज झोंकों से,
पंख लगा मैं उड़ने लगी।

दुल्हन बनी, वह मेरे आँगन में,
विदा हुई, फिर ससुराल गई,
विरह व्यथा से व्याप्त हुई मैं,
मन को बहुत संताप हुआ।

प्रबल हुई थी मैं अनुराग से,
सबल हुई थी  मैं बहार से,
मेरी बेटी की नन्हीं बेटी,
खेली थी जब मेरी गोदी में।

मेरी माँ, मैं उनकी बेटी,
मेरी बेटी, फिर उसकी बेटी,
छुपा है, सृष्टि का विधान,
पीढ़ी दर पीढ़ी के सृजन में।

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