पूर्ति (लघुकथा)

किसान के दो बेटा पैदा हुए। दोनों बच्चों के जन्म वाले दिन किसान ने अपने आँगन में दो पौधे आम और नीम का रोपा था। बच्चों के साथ-साथ पौधे भी बढ़ने और पनपने लगे। वृक्ष बन गये दोनों पौधों पर  बहुत से पक्षियों का घोंसला बन गया। धीरे-धीरे घोंसले में पक्षियों के बच्चे चहचहाने लगे।
समय बीतने लगा। किसान के बच्चे भी बड़े हो गये। फिर एक समय ऐसा आया जब किसान के दोनों बच्चे अपनी महत्वाकांक्षा और उन्नति के  कारण अपना देश छोड़कर विदेश के धरती पर जा बसे।
 
ऐसे समय अकेले पड़ गये किसान और उनकी पत्नी को तसल्ली मिला उनके लगाये वृक्षों और उस पर विराजमान पक्षियों के घोंसले से।
किसान को जब अपने बच्चों की याद सताती थी तब वह इन पेड़ों के नीचे आकर बैठ जाता था। उस समय पेड़ों की ठंड़ी बयार और पक्षियों की मधुर कलवर ही उन्हें ढ़ाढ़स बँधाकर उनके जीवन को जीवंत करता था। इस प्रकार उनका जिंदगी इन पेड़ों और पक्षियों के बीच सुकून से कटने लगी।
 
जीवन के अंतिम पड़ाव पर किसान को गर्व था कि उन्हें जीवन में जो कमी अपने बेटों के दूर जाने के कारण महसूस हुआ, उसकी पूर्ति इन सींचें गये पेड़ों और उस पर बसे पक्षियों ने पूरा कर दिया।
 
सकारात्मक सोच से किया गया कार्य हमेशा अच्छा प्रतिफल ही देता है।
 

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