रोटी (कविता)

रोटी, जिंदगी जीने का आधार है ,
हर चेहरे की मुस्कान है।
रोटी, पेट की ज्वाला है ,
सबको बेचैन करती है।
रोटी, एक आरजू है,
पर तृप्ति का साधन भी है।
रोटी, एक जरुरत है,
प्रेम व विश्वास है।
रोटी, एक आधार है,
स्वार्थ व अभिमान है।
रोटी, एक अभिलाषा है,   
जागृत और जीने की।
रोटी, संबल व विश्वास है,
आत्मनिर्भर बन जाने की।
रोटी, एक अजूबा है, 
जिसमें जंग व चुनौती है।
गोल-गोल चाँद जैसा,
चकरघिन्नी सा घुमाता है।
सच व झूठ के दायरे में,
यह लोगों को बाँधता है।
रोटी, पाप-पुण्य के बंधन में,
जकड़ता व मुक्त करता है।
रोटी, के केन्द्र बिंदु में,
सारा विश्व घुमता है।
रोटी, के चक्रव्यूह में,
सारा विश्व फँस जाता है।
रोटी, गरीबी-अमीरी की दिवार है,
पर उम्मीदों की आस है।    
रोटी, हमारी पहचान है,
जीवन की आधारशिला है।

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