सुरुर मायके का (लेख)

(कुछ बातों के प्रति सचेत रह कर मायके के सुरुर व गुरुर के आड़ में होने वाले कृत्यों के दुष्प्रभावों एवं दुष्परिणामों से बचा जा सकता है।)
 
ससुराल जा कर भी लडकियां अपने मायके से जीवनपर्यन्त जुड़ी रहती है। मायके के प्रति वे स्नेहमयी व संवेदनशील होती है इसीलिए मायके के सुरुर में मस्त रहना हर लड़की अपना अधिकार समझती है। उसे अपने मायके पर नाज होता है। यह नाज होना लाजमी भी है क्योंकि अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा वह जिस  एहसास व लगन के  सुरीले ताल से गुनती, गुनगुनाती व अलापती हुई बड़ी होती हैँ...उसी लड़की से यह उम्मीद करना कि वह मन मे उठते ऐसे झंकृत तरंगों को ससुराल की दहलीज पार करते ही एक झटके में नकार दे ...यह संभव नहीं है।
शादी के बाद मायके के घर आंगन को छोड़कर ससुराल के अंजान माहौल में कदम रखने वाली लड़की को दोनो आंगन की धूप छांव को समझने में थोड़ा वक्त लगता है ,पर बदलाव के मापदंड पर उसकी सोच व समझ सकारात्मक होनी चाहिए। भूल से भी उसे नादानी या नासमझी की बलिवेदी पर भेंट नहीं चढ़ना  चाहिए। क्योंकि कभी कभी मायके का यही  सुरुर व नाज अपनी सीमाओं को लांघकर गुरुर रुपी अंधकार में बदल जाती है, तब रिश्ते की मर्यादा को संतुलित रखने में अक्षम व नाकाम साबित होती है। ऐसी स्थिति में ना सिर्फ उनकी अपनी गृहस्थी की  नींव  डगमगाती है,अपितु अपनी तपिश से वह दोनों परिवार के सुख शांति को नष्ट करने में सक्षम हो जाती है। इसीलिए कहा जाता है कि मायके के सुरुर में मस्त रहना ठीक है, पर मायके के गुरुर में कुछ ऐसा करना जो किसी विस्फोट से कम न लगे और किसी के हित में ना हो, गलत है।      माधुरी ने यही किया। बात-बात में जिद, अकड़, हेठी व जोर आजमाइश का ताना बाना बुनकर ससुराल वालों से  तुनकने लगी। और  परदेस में रहने वाले पति का कान भरने लगी। फिर एक दिन तैश में आकर मायके में धरना दे दी। उस समय मायके वालों ने यह जरूरी नहीं समझा कि वह सही गलत का आकलन करते और बेटी को समझाते। उन्होंनेे वहीं समझा  ,जो माधुरी ने उन्हें समझाया। वे उसी को सही मान कर वह चुप हो गए। पर ससुराल वाले स्तब्ध  हो गए। उनके लिए यह अनहोनी घटना थी।
कुछ दिनों बाद मायके की लाडली माधुरी को जब मायके में सबके व्यवहार में बदले बयार  की तपिश महसूस हुई तब उसे अनुभव हुआ कि ससुराल वालों को गिरफ्त में ले कर अपना उल्लू सीधा करने का उसका प्रयास खुद उसके गले की फांस बन गई है। उसने सोचा,'बात का बतंगढ़़ उसी ने बनाया, तैश में ससुराल उसी ने छोड़ा, ससुराल वालों के साथ पति और बच्चे को मानसिक पीड़ा दिया तो उसी ने दिया। अब वह दोष दे तो किसे दे ?'
इसीलिए मन शांत व स्थिर होने पर..पश्चाताप की अग्नि में जलने के बावजूद वह ऐसी हिम्मत नहीं जुटा पाई कि पहले वाली अपनी स्थित में वह पुनः लौट सके।
यह सिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं है बल्कि समाज में ऐसी बहुत सी लड़कियां मिल जाएंगी जो ससुराल में छोटी छोटी बात पर ऐठं कर मायके में जम जाती है।
अतः किसी भी नवविवाहिता के लिए यह आवश्यक है कि वह मायके के सुरुर में होने वाली छोटी छोटी गलतियों से बचे, जिससे उसका वैवाहिक जीवन प्रभावित ना हो।
ऐसे कृत्यों से बचने के कुछ उपाय व सुझाव है। जिन्हें अमल में ला कर उन के दुष्प्रभावों व दुष्परिणाों से बचा जा सकता है।

दहलीज पार ना करे
अहंकार की आड़ में कई बार बात बात में तुनक कर ससुराल की दहलीज लांघ कर मायके की कुंडी खटखटाने वाली लड़की की ऐसी स्थिति हो जाती है कि वे न घर की होती है ,ना घाट की । वह समाज में  हंसी की पात्र बन जाती हैँ।
अतः खुद अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने वाली ऐसे गुरुर से बचना चाहिए।

दोहरा मापदंड घातक है
पिता की बंदिशें, मां की नसीहतें, बड़ों की डांट फटकार, पास पड़ोसन की छींटाकशी भाई-बहनो व मित्रों से ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, चुलबाजी, हंसी ठिठोली या नोंक-झोंक जैसी घटना मायके और ससुराल दोनों जगह होती है।
पर ऐसे समय में मायके की घटना को चुप्पी व  सावधानी से सह लेना और ससुराल की घटना को तिल का ताड़ बनाने वाली लड़कियों के लिए...दोहरा मापदंड घातक होता है। इससे बचना ना चाहिए और दोनो के मान सम्मान को सम्मान दृष्टि से आंकना चाहिए।

सकारात्मक सोच बनाए
लड़कियां मायके में अपना भविष्य सवांरती है। पर ससुराल में उनके साथ साथ चार और  जिंदगियों का भविष्य उनके सोच पर टिका रहता है।
अतः सोच को सकारात्मक बनाना चाहिए जिससे ससुराल के पारिवारिक खुशनुमा माहौल की चूंलें ना हिले और परिवार उन्नति के  मार्ग पर अग्रसर हो।

मायके का हस्तक्षेप गुनाह है
ससुराल आने के बाद भी कई लड़कियां अपने  पल पल की खबर मायके पहुंचाती है और उन्हीं के निर्दशों का पालन कर के ससुराल में व्यवहार करती हैं। कई बार यह व्यवहार विपरीत असर डालने वाला होता है और उनके  वैवाहिक जीवन को प्रभावित करता है अतः ऐसे  सलाह व हस्तक्षेप से दूर रहना चाहिए जो खुद के पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा हो।

नाप जोख की प्रतिक्रिया  से बचे
कुछ लड़कियां ससुराल में आते ही नाप जोख की प्रतिक्रिया फंस जाती है। वह खुद क्या करती है, इस बात पर ध्यान नहीं देती। सास ,ननद या परिवार के अन्य सदस्य उन्हें बात बात पर महत्व देते है या नहीं। यदि महत्व देते है, तो ठीक और यदि नहीं देते या चूक जाते हैं, तो वह इस बात पर ठुनकती है या गांठ बांध कर विद्वेषिता का भाव दर्शाती है जो ससुराल के सुख में माहौल को नष्ट कर देती है।          
यह भावना गलत है। यह किसी के हित में सही सिद्ध नहीं होता। व्यवहार में दूसरों का मान-सम्मान और इज्जत करने से, खुद अपना मान  बढ़ता है। इस सत्यता को स्वीकार कर अपना व्यव्हार बनाना चाहिए।

संस्कार मायके की देन है
लड़कियां कभी नहीं चाहेंगी कि उनका मायका  हंसी का पात्र बने। वे जानती है कि उनमें जो संस्कार है वह उनके मायके की देन है। व अपने घर में देखती व समझती है और उसी के अनुरुप अपना आचरण बनाती है। उनका जीवन उनकी दादी, माँ, चाची व भाभी के संस्कारो की छांव में पलता और बढ़ता है।
अतः ससुराल में अच्छे संस्कारों  के प्रदर्शन से अपने मायके का नाम रोशन करना चाहिए, न कि गलत काम करके...मायके वालो को लज्जित करना चाहिए।

असुरक्षा की भावना
कभी-कभी ससुराल में असुरक्षित महसूस करने वाली लड़की मायके के सुरुर को अपना ढाल बना लेती है। कोई उनकी औकात को छोटा या ओछा ना समझे, इसीलिए मायके के बड़प्पन को बघारना उनकी मजबूरी  बन जाती है, पर यह ढाल ज्यादा समय तक साथ नहीं देता इसीलिए अच्छे गुण को अपना ढाल बनाना चाहिए।

परिस्थितियां विपरीत हो
शादी के बाद लड़कियों के लिए मायका पराया नहीं होता। इसलिए दुख की घड़ी या विपरीत परिस्थितियों में ससुराल में प्रताड़ना की शिकार लड़की को मायके से मदद  की गुहार जरुर लगानी चाहिए। ऐसे में मदद मिलती है। जैसे  लखनऊ की कामिनी को मिली।


ससुराल में घरेलू हिंसा व प्रताड़ना की शिकार कामिनी को  मायके वालों ने सहारा दिया। एक बच्चे की मां कामिनी ने जैसे तैसे सहनशीलता के बल पर तीन वर्ष ससुराल में व्यतीत किया। पर जब जुल्म की सीमा पार हो गई, तो उसे मां. पापा के ममता भरे  छांव में पनाह लेना पड़ा। उसे सहयोग व सहारा दोनों मिला। उसी सहयोग के बल पर वह नौकरी करके अपना और अपनी बच्ची के जिंदगी को नए रुप में सवारनें की कोशिश में लगी है।
पर दूसरी तरफ ऐसी भी लड़कियां मिल जाती है। जो तुनकमिजाजी व हेठी के चलते मां-बाप, भाई-बहनो को परेशान करती है। ऐसा करके वे मायके वालो को सामाजिक व मानसिक पीड़ा से त्रस्त करती है।
सहारनपुर के मिस्टर राकेश और उनकी पत्नी.. बेटी की हठधर्मी और मांगों से त्रस्त व तंग है। जब तक उनके बेटे की शादी नहीं हुई थी, वे बेटी के नाजों व नखरे को सहते थे। पर अब बेटा-बहू के सामने बेटी का टांग अडा़ना और ऊलजलूल फरमाइशें करना उन्हें भारी लगता है । मजबूरी में वे ऐसे नाजुक व मासूम रिश्ते को बोझ की तरह ढों रहे है।
अतः सारांश यही है कि लड़कियां अपने मायके और ससुराल दोनों की गुरुर होती है। जहां एक तरफ वे मायके में गुरुर से पल बढ़ कर बड़ी होती है, वही दूसरी तरफ वे बड़े मान सम्मान व इज्जत से वेे ससुराल में कदम रखती है। इसलिए सुरूर की आड़ में उन्हें दोनों की  भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।
मायके और ससुराल में सामंजस्य बैठाना नारी के दुर्लभ व विलक्षण गुणों में से एक गुण है।  अतः जो लड़की इस गुण को अपनाने  में महारत हासिल करती है, वही दोनों पक्षों की चहेती बनकर सुख पूर्वक अपना जीवन निर्वाह करती है।
अब आप स्वयं अपने गुणों का आकलन करके यह जानिए कि आपमें यह  विलक्षण प्रतिभा है या नहीं। यदि है तो बहुत अच्छा। और यदि नहीं है, तो अब से भी संभल जाइए और बदल लीजिए अपने आपको क्योंकि मायके का यही सुरुर व गुरुर पारिवारिक सदस्यों के साथ साथ आपकी खुशियां दीमक की तरह नष्ट कर रही है और आपको पता भी नहीं चल रहा है।
                

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