सकारात्मक सोच से अभिभूत हुई मैं (लघुकथा)

शांत दिखने वाली बादलों की झुंड तड़कने, गरजने और चमकने के साथ ही जब झमाझम गिरते हुए बूंदों से धरती को ढ़कने लगी, तब मेरा भी मन सतरंगी छतरी ले कर बाहर जाने को मचल उठा। पर मन मारकर मायूस सी मैं बालकनी में बैठ गई और उल्लसित उन्माद से भरी झमझमाती बूंदों से आह्लादित होने लगी। 
अचानक रसोईघर में रखे बरतनों के ढ़ेर, और गंदे होते घर और  रसोईघर की याद आते ही मन और उदास हो गया।  काम वाली बाई राधा यदि आज नहीं आई तो बरसते बूंदों का मेरा तो सारा मजा बढ़ते काम के बोझ के कारण किरकिरा हो जायेगा। उन्माद के इस माहौल में भी मेरा मन दुखी हो गया।
मौसम खुशगवार हो, और चाय-पकौड़े का स्वाद न हो, तो मौसम का आनंद अधुरा ही लगता है अतः मैं पकौड़ी बनाने में भी जुट गई।             
मौसम के आनंदमय क्षणों में पकौड़े बनाते हुए भी मैं मायूस सी बार-बार बालकनी में आकर उस शांत सूनी सड़क को निहारने लगती थी जिस पर छपछपाती बूंदों के साम्राज्य के कारण आवा-जाही बिलकुल ठप्प था। इसलिए राधा का आना भी नामुमकिन ही लग रहा था।
अचानक उन्मुक्त, उत्सुक अठखेलियों से मदमस्त चाल से ठुमकती हुई अंदाज में बोरी को ढ़ाल बनाये एक चंचल छाया बहकती सी आती हुई दिखी। मैं अवाक सी उस मदमस्त जीवंत सी चाल में उलझी थी कि कौन हो सकता है, जो इन बदहवास बूंदों की परवाह किए बगैर उन्मुक्त चाल से चला आ रहा है? तभी कुछ सोचती सी वह छाया मुड़ी, फिर पीछे जाकर गायब हो गयी। थोड़ी देर बाद फिर प्रगट होकर ठुमकती हुई वह मेरे दरवाजे पर आ रुकी। अब तक मैं समझ चुकी थी कि यह राधा ही है। राधा के बहकते कदम पानी के बड़े-बड़े बूंदों के झोकों के साथ बहकर इधर आने से मेरी बांछें खिल गयी। मैंने देखा, सतरंगी सावन सी तरंगीत थी, उसकी मुस्कान। चमकते बिजली सी चमकती-दमकती थी, उसकी आँखें। ऐसे विध्वंसक बरसात में उसके न आने की उम्मीद के कारण जँहा मैं खुलकर मुस्कुरा भी नहीं पा रही थी, वहीं उसकी निश्चल मुस्कान ने दिल को झकझोर कर जीतने के साथ ही उत्साहित कर दिया।
तहेदिल से  चाय-पकौड़े से स्वागत करते हुए भी बरबस मेरे मुख से निकल पड़ा," राधा, ऐसे झमझमाती बरसात में जब तुम्हारे पास सर छुपाने को छाता भी नहीं था तब तुम्हें इस बोरी को अपना ढ़ाल बनाकर भींगती दुबकती सी आने की जरूरत ही क्या थी? मैं मन मारकर सब्र कर ही लेती। काम भी किसी तरह निपट ही जाता।"
मेरे प्रश्न पर वह हँस पड़ी, बोली, "आप भी न दीदी,  कुछ समझती नहीं है? यदि आज मैं छुट्टी करते हुए घर में बैठी रहती तो इस मदमस्त करने वाली बरसात का मजा कैसे ले पाती? सतरंगी सावन का मजा भी मुझे भरपूर लेना था और गरमागरम पकौड़े-चाय से आपने जो मेरा स्वागत भी किया, उससे भी वंचित मैं होना नहीं चाहती थी। फिर आप ही बताइए, ऐसे मनमोहक सुख को छोड़कर घर बैठने से मुझे क्या मिलता? न कोई घर का काम गति से  होता और न मौसम की खूबसूरती का मजा ही कोई लेने देता। इसलिए ऐसे मौसम में छुट्टी करना मुझे बिलकुल भाता नहीं है।" 
"फिर तुम पीछे मुड़कर कँहा गायब हो गयी थी?"
"अरे दीदी, ऐसे सुहाने मौसम में मुँह की शुद्धि के लिए भी तो कुछ चाहिए था? मैं वही लेने चली गयी थी।" वह हँसकर बोली।
जीवन में बनावट से दूर, प्रकृति के करीब होने की उसकी सकारात्मक जीवंत कथा सुनकर मैं अभीभूत हो गई और उसकी उन्मुक्त, उल्लास से पूर्ण पागलपन में ऐसे खोई कि उसके जाने के बाद ही मैं छतरी लेकर छत पर गयी ,थोड़ी देर बाद ही छतरी को भी बहकने के लिए छोड़कर उतावली सी मदमस्त हो भीगने और उल्लसित होने लगी।

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