गौरैया पक्षी (अटूट रिश्ता-4) (यादगार लम्हें)

पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं के साथ व्यतीत कियें हुए अंतरंग अनुभव (अटूट रिश्ता-4)

चीं-चीं, चूं-चूं करके चहकने-फुदकने और दाना चुगने वाली नन्हीं गौरैया हर दिल अजीज की घरेलू पक्षी होती है। इसके चहकने-फुदकने से घर का वातावरण खुशनुमा लगता है।
राजाजी पुरम् वाले घर के रसोईघर में एक रोशनदान था।  इस खिड़की पर गौरैया अपना घर बनाने लगी। वह एक-एक तिनका को चोंच में दबाकर लाती और खिड़की पर रखती। एक तरफ जाली, एक ईंट की जगह और दूसरे तरफ से कोई आधार न होने की वजह से अधिकांश तिनका जमीन पर गिर जाता। गौरैया को कोई परेशानी नहीं लगता। वह धुन की पक्की थी। तिनका चाहे गिरे या टिका रहे... उसका काम था बस तिनका बाहर से चोंच में पकड़कर लाना और सहेजना। वह बार-बार उड़कर जाती और फिर आती। जाती और आती, फिर जाती और आती। यह क्रम पूरे दिन चलता जैसे वह थकती नहीं थी। वह उन्हीं टिके तिनकों से घोसला बनाने में पूरी तत्परता से जुटी रहती। उसकी कड़ी मेहनत और लगन को मैं देखती रहती। मुझे डर लगने लगा कि इसका घोसला यहाँ टिकेगा कैसे? एकदिन मैं एक ईंट को खिड़की पर तिरछा करके टिका दी ताकि यदि घौसला बने तो वह टिका रहे। धीरे-धीरे गौरैया का घोसला बनकर तैयार हो गया। घोसला में अंड़े आ गये। गौरैया अपने अंड़े का बहुत ध्यान रखती थी। फिर उसी घोसले से गौरैया के बच्चों की चीं-चीं, चूं-चूं की आवाज मधुर संगीत की भांति गूजनें भी लगी। गौरैया दाना चुग कर लाती और प्रेम से चुगाती। बच्चे बेचैनी से माँ की इंतजारी करते। माँ की आहट मिलते ही उनकी गर्दन उपर हो जाती और चोंच खुल जाते और देर होने पर चीं-चीं चूं-चूं का मधुर मनुहार भी सुनाई पड़ने लगता। यह क्रिया इतना मनोरंजक होता कि मुझे रसोईघर में देर तक टिकने का उबाऊपना भी बुरा नहीं लगता था।
गिरते तिनके से मेरे पति को गंदगी महसूस होता, तो वे गौरैया के घोसले का विरोध किए, पर मेरे संरक्षण से घोसला आबाद रहा। मेरे रहते तक गौरेया ने कई बार घोसला बनाया और बच्चे दिए। घोसले से बाहर आने पर वे  बच्चे मेरे आंगन में अपनी माँ के पीछे-पीछे उड़कर उड़ना सीखते और दाना अपने आप भी चुगते। और एकदिन वह भी आता जब वे उड़ने में पारंगत हो जाते, तो उड़कर कहाँ चले जाते, पता ही नहीं चलता। 
वैसे इन गौरैयों के लिए मुसीबतें भी कई बार आयी। कभी इनके अंड़े गिरे तो कभी नन्हें बच्चे। बच्चों को मैं छू नहीं सकती थी, क्योंकि तब मान्यता के अनुसार गौरैया उसे मार डालती। मैं सतर्कता बरतती और उत्सुक अपने बच्चों को  छूने भी नहीं देती। एक बार गिरे गौरैया के बच्चे को बिल्ली से बचाने के लिए मैं रात में उसे जाली वाली डलिया से ढ़ककर उपर से ईंटा रख देती। सुबह डलिया हटा देती। यह क्रम तब तक चला, जब तक कि बच्चा उड़ना नहीं सीख गया। 
गौरैया से संबन्धित एक मजेदार बात राजाजी पुरम में ही हुई। क्योंकि प्रयास करने के बाद भी वैसी आटा की गोली पर टूट कर आटा चुगने वाली गौरैया मुझे कहीं नहीं मिली। पैर में दर्द के कारण मैं नीचे बैठकर खाना बनाती थी। यहाँ की गौरैया आटा के छोटे टुकड़े को बड़े चाव से खाती थी। रोटी बनाते समय मै दरवाजे के पास छोटे-छोटे टुकड़े फेंकती। न जाने कैसे आहट पाकर ढ़ेर सारी गौरैया आवाज करती आटे के टुकड़े को चोंच में दबाती, चुगती और लेकर उड़ भी जाती। कभी-कभी मैं अपनी अंगुली पर आटा चिपकाकर हाथ आगे कर देती और दम मार कर बैठ जाती। पहले वे डरती फिर उसी झुंड में से जो हिम्मती होती वह आगे आकर झटपट आटे को चोंच से पकड़ती और फुर्र हो जाती। फिर मैं दूसरा आटा चिपकाकर बैठ जाती। बहुत मजा आता था गौरैयों के साथ यह खेल खेलने में। मेरा समय भी सुखपूर्वक बीत जाता था।
एक दो बार कमरे के टांड पर भी गौरैया घोसला बनाने की कोशिश करती, पर उनके ऐसा करने से पहले ही मैं उन्हें उड़ाकर दरवाजा बन्द कर देती। कमरे में पंखा चलता था और उनके जान को खतरा था। दो बार तो वैसे ही गिरी पड़ी गौरैया मुझे मिली। एकबार तो टीवी पर ऐसे बैठी थी जैसे जिंदा हो। उस बेजान गौरैया को बाहर डालने में मुझे बहुत दुख हुआ था। वह गौरैया मुझे आज भी याद है।
मैं गौरैया के लिए चावल आज भी डालती हूँ। पर विलुप्त या कम होने वाली गौरैया आज जब मेरे घर-आँगन में चहकती-फुदकती दिखती है, तब मेरा मन उनके साथ उल्लसित और आनन्दित होकर फुदुकने और चहकने लगता है। 

No comments:

शंखनाद (कविता)