उल्लू पक्षी (अटूट रिश्ता-3) (यादगार लम्हें)

पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं के साथ व्यतीत कियें हुए अंतरंग अनुभव (अटूट रिश्ता-3)

बचपन में बिजली के खम्भों पर अक्सर भूरे रंग का छोटा उल्लू दिख जाता था। उस समय यही पता था कि उल्लू देखना अशुभ माना जाता है। तब भी मैं उससे डरती नहीं, बल्कि पक्षियों को निहारने की आदत के कारण उसे ध्यान से देखने लगती थी।  
उस समय यह कल्पना से परे था कि उल्लू की दूसरी प्रजाति- आकार में उससे बहुत बड़ा, सुंदर, झकाझक सफेद और आकर्षित करने वाला उल्लू जिसे लक्ष्मी वाहन भी कहते है, को मैं कभी देख भी पाऊंगी। सिर्फ देखना ही नहीं, बल्कि ऐसे ही आकर्षित करने वाले उल्लू का एक जोड़ा कभी मेरे घर में आकर स्वेच्छा से रहने भी लगेगा। है ना ये अजुबा। हो गये ना आप भी आश्चर्यचकित? पर ये सच्ची घटना है। बिलकुल ऐसा ही उल्लू का एक जोड़ा करीब पाँच वर्ष मेरे घर में रहा। 
अनहोनी प्रसंग है ना ये ? आप पूछेंगे कैसे? तो मैं बताती हूँ कि कलोनी के व्यस्ततम आबादी वाले इलाके में एक उल्लू के परिवार का बसेरा होना अचम्भित ही करता है। 
हम लोगो को राजाजीपुरम् का मकान छोड़ना था। अखबार के विज्ञापन के आधार पर मैं बेटा सुधांशु के साथ गोमतीनगर में एक मकान के नीचे का भाग, जो सुंदर व व्यवस्थित था, उसे पसंद कर लिए। हड़बड़ी थी, इसलिए ज्यादा गहराई में नहीं गये। झटपट हाँ करके रहने आ गये। 
इस मकान के उपर दो मंजिल और छत का ढ़ाँचा ईंटों से बना खड़ा था। अधुरा काम हम लोगो के रहने के बाद भी कुछ दिन जारी रहा, फिर बंद हो गया। उपर वाला भाग वैसे ही अधुरा खंडहर जैसा पड़ा रहा। मकान के भौगोलिक भाग की जानकारी देना इसलिए जरुरी है, क्योंकि यही उल्लू के निवास का कारण बना। इस मकान के उपरी हिस्सा में सामने की ओर तीन त्रिकोण आकृति बनी थी। दो तो बंद डिब्बे जैसा था, पर बीच वाला खोखला था, जिसमें गोल बड़ा सा छेद था। जिससे अन्दर बाहर आया और जाया जा सकता था। यह आकृति किस उद्देश्य से बना था, यह समझ से परे, पर अजीब भी लगता था। लेकिन जब उसी में एक दिन उल्लू का एक जोड़ा रहने लगा, तब मैंने अनुभव किया कि जीवन में कुछ भी निरर्थक नहीं होता। इस विचित्र तिकोन आकृति के बनाने का उद्देश्य जो भी रहा हो,जिसके भी मन की उपज हो, पर आखिर में उसकी सार्थकता ऐसे सिद्ध हुई कि वह एक पक्षी परिवार का रैन बसेरा बन गया। 
धीरे-धीरे ये कालोनी में जग जाहिर हो गया कि मेरे घर में उल्लू का निवास है। मेरा घर उल्लू वाला घर के नाम से प्रसिद्ध होने लगा। अब आने-जाने वाला हर बंदा एकबार नजरें उठाकर उपर निहारता जरुर, फिर वह आगे बढ़ता था। अब मैं और मेरे परिवारिक लोग भी इसमें रुचि लेने लगे। ये जोड़ा शाम होते ही एक दूसरे से सटे हुए बाहर को मुँह किए छेद में आकर बैठ जाते, फिर इनके भोजन पानी की दिनचर्या शुरु हो जाती। ये भोजन की खोज में उड़ते, कहीं जाते फिर आकर छेद में मुँह बाहर निकाल कर बैठ जाते। हम उसे घंटों निहारते। दो बिलकुल झकाझक श्वेत, सुंदर और आकर्षित करने वाले लाजवाब उल्लू का जोड़ा जब टूकुर-टूकुर करके हमको भी एकटक निहारता और  बातें करता प्रतीत होता, तो वह पल बहुत ही सुखदायी और सुंदर लगता था। और मुझमें आत्मविश्वास और आत्मबल की बढ़ोत्तरी होने से गर्व का एहसास भी होता। 
मेरे घर के सामने रहने वाली आंटी अक्सर उल्लू के जोड़े की खूबसूरती के गुणगान करती, तब मुझे उनसे बहुत ईर्ष्या होती थी, क्योंकि वे अपने घर के अंदर से भी उल्लू को निहार लेती थी और मुझे उसे देखने के लिए विशेष रूप से बाहर निकलना या छत पर जाना पड़ता था। मैं लगन की पक्की थी इसलिए मैं भी घंटों इनके दर्शन के लिए लालायित बाहर बैठी रहती। भोर में नींद खुलते ही चुपके से बाहर आ जाती। कुछ समय बाद इनके बच्चे भी हुए। बच्चे भी जोड़े में बिल में वैसे ही बैठते जैसे उनके माता-पिता बैठते थे। ये इतनी उँची आवाज लगाते कि पूरी कालोनी इनकी आवाज से गूँज जाती। मैं डर जाती कि कहीं किसी पड़ोसी को परेशानी न हो जाए। इनकी बुलंद आवाज पर दबी जुबान में विरोध तो सुनाई पड़ा पर प्रत्यक्ष रुप से किसी ने कभी भी विरोध नहीं किया। पाँच साल यह जोड़ा सुख पूर्वक यहाँ निवास करता रहा, हर साल ठंड शुरु होते ही इनके बच्चे भी होते, जो उड़ने के लायक होते ही कहीं और जाकर बसेरा बना लेते। यह जोड़ा फिर भी यहीं ही रहता। इनके रहने से आत्मीय सुख की अनुभूति में बहुत बड़ी तसल्ली और सुकून मिलता था। 
इनके रहने के समय एक दुखद घटना घट गई। एकदिन दोपहर में उल्लू की आवाज सुनकर मैं बाहर आई तो मुझे डरा और घबड़ाया हुआ उड़कर पेड़ पर बैठा दिखा। वह तेज आवाज निकाल रहा था क्योंकि उसके घर पर एक मोटे बंदर ने हमला कर दिया था। बंदर बौखलाया हुआ बहुत उग्र था। वह बार-बार कूदकर जाता और अपना हाथ बिल के अंदर डालकर टटोलता। यह तो अच्छा हुआ कि वहाँ बैठने या पकड़ने के लिए कोई जगह नहीं था। अतः बंदर देर तक वहाँ टिक नहीं पाता था और छेद इतना बड़ा नहीं था कि बंदर अंदर-बाहर कर सके। मैं ईश्वर से प्रार्थना करती रही कि भगवान इनकी रक्षा करना। कुछ पाने में असमर्थ बंदर आखिर हारकर चला गया, तो मैं चैन की सांस ली। खैर बला टल गई। उल्लू का परिवार आकर फिर अपने घर में रहने लगा। 
मैं भी इन उल्लूओं के प्रेम में दिवानी होकर इन्हें घंटों निहारती, आवाज सुनती और छेद में न दिखने पर इंतजार भी करती। उनके कई टूटे पंख आज भी मेरे पास सुरक्षित है। कैमरे में कैद करने की कोशिश कई बार की, पर कर नहीं पायी क्योंकि उपर की दूरी की वजह से फोटो कभी साफ आया ही नहीं। 
मकान मालिक को मकान बेचना था, इसलिए मैंने मकान खाली कर दिया और पास के ही एक मकान में रहने लगी। करीब साल भर तक उस मकान की चाभी मेरे पास ही था। अतः अक्सर मैं वहाँ  समान लाने के बहाना से जाती और उल्लू का दर्शन करती। धीरे-धीरे यह सिलसिला कम होता गया। नये लोगों ने मकान खरीदने के बाद काफी तोड़-फोड़ किया। जिसके कारण उल्लूओं का बसेरा भी टूट गया। पर उस समय के अविश्वसनीय, अकल्पनीय घटना जिसको मैंने पाँच साल देखा, समझा और अनुभव किया वह आज भी मेरे मन मन्दिर में अपना सुंदर जगह बनाकर जीवित और विराजमान है। 

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शंखनाद (कविता)