माँ ऐसी ही होती है (संस्मरण)

मैं अपने चचेरे भाई की शादी में गोरखपुर गई थी। बहूभोज के बाद रात में ही हमारा लखनऊ के लिए आरक्षण था। अतः कार्यक्रम के बीच में ही हमें स्टेशन पँहुचना था।
सही समय पर मैं पति और बच्चों के साथ सबसे विदा हुई। माँ से विछोह की वेदना करुण था, अतः सजल नेत्रों से माँ को निहारती हुई रिक्सा में बैठ गई। रिक्सा के आगे बढ़ते ही बेटी शालू बोली," मम्मी आते समय नानी ने आपके बैग में कुछ रखा था।"
मैं सोच में पड़ गई।दुखी मन अब उत्सुकता की हुदबुदाहट और सोच में ड़ूब गया कि ऐसा क्या था जो माँ मुझे प्रत्यक्ष न पकड़ाकर चुपके से थैला के सुपुर्द कर दी। माँ के उस गुप्त भेंट को देखने की उत्सुकता और उतावलापन इस कदर बढ़ने लगा कि रिक्सा की चाल चींटी की चाल लगने लगा।
स्टेशन पर बैग में हाथ डाला तो दिल धक से धड़क गया, क्योंकि बैग में वही नयी साड़ी थी जिसे तैयार होते समय मुझे दिखाकर पूछी थी कि यह कैसी है?
साड़ी सुंदर थी। फाल-पीको भी किया हुआ था। मैं माँ के पीछे पड़ गयी कि आप इस मौके पर यही साड़ी पहन लीजिए। मेरे लाख प्रयास के बाद भी माँ वह साड़ी नहीं पहनी तो नहीं पहनी। चहल-पहल के कारण मैं माँ के उस ममता का आंकलन नहीं कर पायी जो उस समय उनके मन में हिलोरे मान रहा था। माँ कब साड़ी मेरे बैग में रख दी, मैं यह देख नहीं पायी थी वरना उसे लेने से मना करती।
परंतु अब माँ के निश्चल प्रेम से पगा यह अप्रत्याशित-अनुपम उपहार मेरे लिए अनमोल वरदान हो गया।
माँ की याद में मेरा मन उनके स्नेहिल स्नेह से सिंचित उस स्नेह रुपी सौगात(साड़ी) के आगोश में समा गया जो स्वर्ग से भी अधिक सुंदर, अद्भुत और आनन्दवर्ध्दक था।
माँ ऐसी ही होती है...प्यार, ममता और त्याग के एहसास से भरी हुई।

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शंखनाद (कविता)