मेरे सपनों का महल (संस्मरण)

बचपन में मैं छोटी कविताएं लिखती थी। एक कविता मैंने बेटा संजीव के जन्म पर लिखकर उपहार स्वरूप शीशे में फ्रेम कराकर दीदी को भेंट में दी थी। 
लेखनी की प्रतिभा मुझमें छुपी है...इस अनुभव से पहले मैं अनजान थी क्योंकि हिंदी भाषा पर मेरी पकड़ उतनी गहन और गम्भीर नहीं थी जितनी गहरी जानकारी इस क्षेत्र के लिए जरुरी था। कह सकती हूँ कि मन में छुपी चाह... लिखने को आतुर था, पर कदम आगे बढ़ाने की चाहत बलवती नहीं हो पा रही थी।
एक पत्रिका में छपे संस्मरण को देखकर मैंने अपनी चाहत अपने करीबी के सामने  जब बयां की, तब उनके व्यंग्यात्मक हँसी ने मेरे पंख लगे हिम्मत को मरोड़कर तोड़ दिया...  फलस्वरूप मैं खामोश और निष्क्रिय हो गई....उड़ नहीं पायी। 
लेकिन जिंदगी के एक मोड़ पर  बेटी शालू ने मुझे उकसाकर एक लेख के रुप में मेरी लेखनी की नींव रखवा दी और मुझे इस नींव पर महल बनाने की प्रेरणा दी। तब मेरी सुप्त और सिमटी चेतना जाग्रत हुई और कुछ सोचकर मैं लिखने लगी। मेरे कुछ लेख और समाचार विश्लेषण पत्रिका में छप भी गये। लेकिन इसके बावजूद भी मैं अपने कार्य को व्यापक रुप में प्रस्तुत करने में असमर्थ महसूस कर रही थी कि तभी बेटा संजीव ने मुझे  उकसाया, झकझोरा और कुछ लिखने की चुनौतियाँ दी और मुझे अपने सपनों के महल को मूर्त रुप में बदलने की प्रेरणा दी।
अब मेरे सुप्त सपनें जाग उठे। मैं सोच को साकार करने में जुट गई। लिखने की चाल तेज कर दी। मेरी कुछ कहानियाँ, लेख ,व्यंग्य और संस्मरण पत्र-पत्रिकाओं में छपे और पुरस्कृत भी हुए। मेरी तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुई।
जगाया शालू ने, बढ़ाया संजीव ने। यद्यपि मेरे सपनों का महल आज निर्माणाधीन है, फिर भी मैं अपनी बेटी और बेटा की शुक्रगुजार हूँ, जिसकी प्रेरणा व सहयोग के कारण मेरे सपनों का महल एकदिन अपनी बुलंदियों को छूने की ओर अग्रसर होगा...।

1 comment:

Unknown said...

Very good

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