सिक्किम - कुदरत के खूबसूरत करिश्माई नज़ारे (यायावरी)

कुदरत के करिश्माई नजारों का लुफ्त उठाने में एक और खूबसूरत नाम हमारे घुमक्कड़ी लिस्ट में जुड़ गया जब हम अपने देश के पूर्वोत्तर में स्थित सिक्किम राज्य घुमने गये।
साउथ का प्रोग्राम बनते बनते जब सिक्किम का प्रोग्राम बन गया तो मैं इतनी उत्साहित नहीं हुई जितना होना चाहिए। पर धीरे धीरे जानकारी मिलने पर आश्वस्त होने के साथ साथ ख़ुशी से लबरेज भी होने लगी कि हमें प्रकृति के रमणीक एवं दर्शनीय स्थल में घूमने- फिरने और महसूस करने का मौका मिलेगा।

लखनऊ से हम जलपाईगुड़ी स्टेशन के लिए शाम को ट्रेन पकड़े। सुबह आँख खुलने पर  जब बाहर का नजारा लिए तब पलकें एक पल को भी झपकनें के लिए तैयार नहीं थी। दूसरे दिन सुबह जलपाईगुड़ी स्टेशन से बाहर निकलकर हमने टैक्सी बुक की। यहाँ से गंगटोक की यात्रा भी हमारे लिए नवीनता से भरपूर था इसलिए हम एक एक सीन का अवलोकन सूक्ष्मता से करते रहे।

गंगटोक की खरीदारी -------
गंगटोक में हमारा होटल मालरोड से उपर की पहाड़ी पर था। होटल पहुचँकर हम फ्रेश हुए। खाना खाये फिर माल रोड़ घूमने के लिए पहाड़ियों से उतरकर नीचे आ गये। रौनक और चहल-पहल से भरपूर गुंजायमान मालरोड़ की चंचलता और चपलता में हम भी चंचल होकर खाने पीने के साथ साथ फोटोग्राफी और खरीदारी का मजा लेते रहे। मालरोड़ पर हमें दिल्ली और लुधियाना का माल भी दिखा पर हमने उन्हीं चीजों को देखने, पसंद करने और खरीदारी में रुचि दिखाये जो वहाँ की पारम्परिक और अलग सी लगी। महात्मा गाँधी के मुख्य बाजार से हमने तिब्बती हैंडमेड चीजें खरीदे। उसके बाद हमने सिक्किम के फेमस उनी कार्पेट और ब्लैंकेट देखे। सिक्किम की कॉटन  के कैनवास पर बनने वाली पारम्परिक पेंटिंग ठंगकाज भी काफी प्रसिद्ध था। इसकी फ्रेमिंग रेशम से होती थी। लकड़ी से बनी कलाकृतियाँ भी हमें खूब पसंद आई। तिब्बती स्टाइल का उत्कृष्ट चोकसी टेबल बहुत पसंद आया पर लाने के परेशानियों के कारण हमें अपने मन को काबू में करना पड़ा। दोस्तों को देने के लिए हमने छोटे उपहारों की खरीदारी खूब किए जो हमारे बजट में सही था और हमें लाने में भी परेशानी नहीं हुई।

सुबह का सुहाना दृश्य -----
देर रात में हम लौटकर होटल आ गये। सुबह सुबह ही होटल के कमरे से जो नजारा दिखा ..वह अद्भुत था। श्वेत चमकीले बर्फ की चादरों में लिपटी पर्वतमाला मन को इतना लुभाने लगीकि वहाँ से हटने की इच्छा ही नही हो रही थी। हमने जल्दी जल्दी इस नजारें को कैमरे में कैद कर लिया और देर तक देखने का मजा लेते रहे।

गंगटोक के आसपास के मंदिर और दर्शनीय स्थल ------ 
अगली सुबह होटल से निकलकर हमने टैक्सी बुक की। टैक्सी से हम घूमने निकल पड़े। हमने कई दर्शनीय स्थल, फूलो की प्रदर्शनी और मंदिरों के दर्शन किये। हम रोपवे से भी सिक्किम का नजारा देखे ।
गंगटोक में हमें पारम्परिक रीति-रिवाजों और आधुनिक जीवन शैली का अनूठा संगम देखने को मिला। जितनी खूबसूरत यह जगह है, उतने ही खूबसूरत और नेकदिल वहाँ के लोग भी थे। आगे हम यहाँ से मुक्सोम गये। यहाँ का आकर्षक स्थल है---पेमयाग्ंत्से मोनस्ट्री, खेचेओपली लेक, सांगा चोइलिंग मोनस्ट्री। यहाँ के लोकलाइट ने हमें बताया कि इस जगह को पवित्र समझा जाता है क्योंकि सिक्किम का इतिहास इससे ही शुरु होता है। नाथुला जाने वाले मार्ग तक भी हम लोग गये थे।

नार्थ सिक्किम -------
अगली सुबह नार्थ सिक्किम घूमने के लिए हम लोग टैक्सी से निकल पड़े। खूबसूरत वादियों के उबड़ खाबड़, पथरीले रास्ते से गुजरती झूमती हमारी गाड़ी ड़रने और हौसलाअफजाई का संगम स्थल बने हमारे दिल को धुक धुक करके धड़कने को मजबूर कर रही थी। लेकिन इस खूबसूरती को निहारने पर हमारे चेहरे पर मुस्कान स्वयं तिरोहित हो जाती थी। इसलिए यह काफी एडवेंचरस रहा।  उँचे-उँचे पहाड़ों के शिखर से झूमती, इठलाती और कल-कल की शोर मचाती श्वेत ,साफ और उज्ज्वल और मनमोहक जलधारा के तीवर वेग  से नीचे आकर नदी के रुप मेंं परिवर्तित होकर बहने की क्रिया बहुत लुभावनी थी। पत्थरों के बीच से बहती इस जलधारा को हम छू कर अपने अगों को भिगोकर उसकी शीतलता को महसूस कर रहे थे । ऐसे झरने हमें बार बार सफर में देखने को मिल रहा था। सभी पर तो नहीं, पर कुछ बड़े झरनों पर रुककर हम मजा जरुर लिए।

पथरीलें रास्ते पर गाड़ी हुई खराब -------
मजा और डर की खिचड़ी तब नसीब हुई जब हमारी गाड़ी का एक पहिया एक बड़े से झरने के पास खराब हो गयी। कोई और विकल्प न होने के कारण ड्राइवर हमें छोड़कर पहिया लेकर पीछे जाने वाली गाड़ी पर बैठकर चला गया। करीब दो घंटें का समय दो सौ मीटर की उँचाई से गिरते कल-कल करते पानी के छिंटों के बीच का समय बहुत रोमांचकारी और मन में डर का धुकधुकी पैदा करने वाला था। दो घंटे बाद टैक्सी ठीक होने पर हम आगे बढ़े। 
यहाँ के पहाड़ की एक अलग पहचान थी। इतनी उँची भीमकाय पहाड़ की खूबसूरती को निहारना ही अपने आप में अद्भुत था। रात के सन्नाटे में भी इस अद्भुत नजारें को नयनों में बसाते हुए हम आगे बढ़ते रहे। रात के बारह बजे हम लाचूंग पहुँचे। वहाँ के मकाननुमा होटल में हमारे गाड़ी की इंतजारी हो रही थी। हम लोगों ने खाना खाया, फिर हम अपने-अपने कमरे में एक नये एहसास के साथ सोने चले गये।

कंचनजंघा को करीब से देखने का अवसर मिला ------
सुबह आस पास के स्थान को पास से देखते हुए हम जीरो प्वाइंट पर जाने के लिए निकल पड़े। विभिन्न रंगीन नजारों के एहसासों के साथ हम आगे बढ़ते हुए जीरो प्वाइंट पर पहुँच गये। हमने उँचे घुटने तक वाले जूते और जैकेट लिए। माउंट कंचनजंघा की चढ़ाई के लिए बने बेस कैम्प भी हमने देखा। बर्फ वाली पहाड़ियाँ कम ही देखने को मिली पर जितनी देखने को मिली, वहीं अद्भुत और निराली थी। यहाँ से हमने दुनिया की तीसरी सबसे उँची चोटी माउंट कंचनजंघा को करीब से देखा।

विचित्र अनुभव -------
सिक्किम की विहंगम-विस्तृत विशालकाय पर्वत श्रृंखलाओं के विस्तार के साथ ही साथ विशाल, विलक्षण, विस्मयकारी, कुदरती झरनों और गहरी खाड़ियों के बीच कभी उपर जाती तो कभी नीचे जाती सड़कों पर सरकती अपनी गाड़ी में बैठकर जो मजा मिलने का मौका मिला उसे हमने अपने दिल दिमाग रुपी आँचल में समेटते हुए विचित्र अनुभव लेते रहे।
लौटकर हम पुनः गंगटोक आये। यहाँ के खाने का लुफ्त उठाने के लिए हम एम जी रोड स्थित फेमस परिवार रेस्ट्रा गये।

सिक्किम की यात्रा जितनी रोमांचकारी, अद्भुत, उत्साहबर्धक और अनुभवों से पूर्ण थी .. यात्रा से लौट आने के बाद भी और आज भी वे दिन, दिल-दिमाग में अपने सुन्दर नज़ारों का अद्भुत एहसास कराते हैं।

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