दो शब्द (संस्मरण)

जिंदगी के झंझावातों के बीच...वर्तमान में विचरते हुए कभी हमारी यादें ...भूतकाल के गहरे स्वप्निल सागर में डूब जाती है, तो कभी हमारे सपनें ...भविष्य रुपी अद्भुत-अनोखे रहस्यमयी आकाश में स्वच्छंद आजाद परिंदों के रुप में अपनी उड़ान भरने को आतुर होती है।
जिंदगी के वे पल कितने अहम् व विशेष होते है जब हम उन लम्हों में अपने अतीत के अथाह सागर की तहलटी में डूबकर स्मृतियों के खजाने से विशेष स्मृति रुपी मोती को एक-एक करके ढ़ूढ़ते है, फिर उन्हें बटोरते है, सजोंतें है और अंत में सुरक्षित रखने का प्रयास करते है।
संस्मरणों की एक-एक मोती (संस्मरण) वेशकीमती और लाजवाब होती है। संस्मरणों की ये एकत्र मोतियाँ कहीं फिर से छूटकर बिखर न जायें...अतः उन्हें बटोरकर माला के रुप में पिरों कर संग्रहित और समर्पित करती हूँ।

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शंखनाद (कविता)