दो शब्द (यायावरी)

एकरसता-एकरुपता से जब मन उबने लगता है, तब परिवर्तन की दरकार होती है। यही यायावरी या यातायात के सम्बंध में भी परिलक्षित होता है।

स्कूल-कालेज या ऑफिस में कुछ दिनों के जी तोड़ मेहनत के बाद जब मन घबड़ाने लगता है, तब मानसिक सुख-शांति और सुकून की प्राप्ति के लिए प्रकृति के सुरम्य अंचलों में निछंद घुमने के अकुलाहट में हम कहीं ना कहीं घुमने का प्रोग्राम बना ही लेते है।

समय, बजट और सुविधा के अनुसार अपने प्रोग्राम को सेट करके हम निकल पड़ते है, उस रमणीक स्थल की सुंदर वादियों मे घुमने-टहलने और मन बहलाने के लिए, जहाँ की यात्रा हमने सुनिश्चित किया था। यात्रा से लौटने के बाद, यात्रा के दिनों की ताजगी जो हम बटोरे रहते है... वह हमारे दैनिक जीवन को उत्साहित करने में अपनी अहम् भूमिका निभाकर हमें जीवंत करती है।

किसी ने सच ही कहा है," यात्रायें हमें घर से दूर ले जाती है।
यात्रायें थककर घर लौट आने का सबक भी सिखाती है।
घर और बाहर का यह रागद्वैत यों ही चलता रहता है।
एक गाँव है...जहाँ से दुनिया देख लेने का स्वप्न उमगता है।
एक दुनिया है...जहाँ से गाँव लौट आने की चाह जाग्रत होती है।"

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शंखनाद (कविता)