नीलकण्ठ पक्षी (अटूट रिश्ता-2) (यादगार लम्हें)

पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं के साथ व्यतीत कियें हुए अंतरंग अनुभव (अटूट रिश्ता-2)

नीले कंठ वाला पक्षी कहलाता नीलकण्ठ है...पर नीलकंठ पक्षी का कंठ तो नीला होता ही नहीं है। है न ये अजूबे वाली बात। पर यही सत्य है। पर आसमानी और नीले रंग के मिश्रण से बने लाजवाब पंख को दोनों तरफ फैला कर नीलकंठ पक्षी जब उपर-नीचे उड़ता हुआ अठखेलियाँ करता है, तो उसकी खूबसूरती देखकर सभी उस पर मोहित हो जाते है। ऐसे ही मंत्रमुग्ध होने वालों की श्रेणी में मेरा भी नाम शामिल है, क्योंकि मैं भी घर वाले लोगों की नजरें बचाकर चुपके से घर के पिछवाड़े जाती और नीलकण्ठ पक्षी की इंतजारी करती। दिखने पर उसे निहारती और जब वह उड़ते हुए दिख जाता तो उसके उड़ने पर मोहित हो कर उसका आनन्द उठाती। यह स्वर्णिम सुख देने वाला पल होता था। 
हाँ, यह इस पक्षी के प्रति लगाव होना, मेरा पागलपन ही था। मैं इस पक्षी के लिए अपना वक्त निकाल ही लेती थी या यूं कहें कि मैं अपने इस पक्षी के प्रेम में ड़ूबकर अपनी आंतरिक खुशी को अन्ततः पा ही लेती थी। यह समय तब का था, जब मैं कक्षा ग्यारहवीं-बारहवीं में पढ़ती थी। और शाहगंज के पहले वाले मकान में रहती थी। इस मकान के पिछवाड़े खेती योग्य भूमि थी और थोड़ी दूर पर एक तालाब और तालाब के किनारे एक पेड़, जो इसकी खूबसूरती बढ़ाता था। यही के बिजली के तारों पर अक्सर नीलकण्ठ आकर बैठते और उड़ते थे। 
बी.एस-सी. करने मैं बलिया रागिनी दीदी के ससुराल गई। यहाँ पहली मंजिल पर बने मकान का पिछला भाग पूरा खुला हुआ था। मकान के पीछे ही एक बहुत बड़ा पेड़ था। शायद वह बरगद का ही था। यह पेड़ नीलकण्ठ पक्षियों का बसेरा था। मुझे तो मन के अनुरूप मांगी इच्छा की पूर्ति का साधन मिल गया। अब मैं नीलकण्ठ पक्षी के रग-रग से परिचित होने लगी। उसकी बोली कैसी है, वह पेड़ की टहनियों पर आकर कब बैठता, कब मस्ती भरे माहौल में ऊपर-नीचे का चक्कर लगा कर कभी अकेले तो कभी कई साथियों के साथ मिलकर उड़ता, आवाज निकालकर मस्ती करता और वे कितने बजे पेड़ के टहनियों के बीच छुपकर सो जाते। यह देखने के लिए मैं किताब-कापी लेकर छत पर पढ़ने जाती और पढ़ने के बीच-बीच में नीलकण्ठ के क्रियान्वयन को आसक्ति भरी नजरों से देखती और खुश होती। । 
लखनऊ और बलिया आने जाने के मध्य मैं ट्रेन की खिड़की से बाहर झांकती हुई बस नीलकण्ठ पक्षी को ही ढ़ूढ़ती, देखती और मंत्रमुग्ध हो उसके उड़ान के साथ उड़ती। इस पक्षी के दर्शन से मुझे बहुत खुशी और स्वर्ग सरीखे सुख की अनुभूति मिलती थी। 
एम. ए. पढ़ने जब जौनपुर आयी तो नीलकण्ठ का दिखना कम हो गया फिर भी कहीं आते जाते मेरी निगाह बिजली के तारों पर नीलकण्ठ को ढ़ूढ़ती, और देख लेने पर आनन्दित होती। 
धीरे-धीरे विलुप्त होते पक्षियों की संख्या के साथ नीलकण्ठ भी लुप्तप्राय होने के कगार पर पँहुच गया है। सफर में बड़ी मुश्किल से कुछ ही नीलकण्ठ दिखता है। अब भी सफर में मैं नीलकण्ठ पक्षी को खोजती, देखती, डूबती-उतराती और आनन्दित होती। यही है मेरे और नीलकण्ठ पक्षी की प्रेम कहानी, जिसमें आकण्ठ ड़ूबी हुई मैं, भगवान शिव की अनन्य भक्त भी बन गयी।

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