सपनों के धूलधूसरित होने की गाथा (कविता)

हाथ के हुनर के प्रबल खिलाड़ी थे वे, 
कामगार कारीगर की पहचान थी उनकी। 
मगर बहुत ही कठिन था, उनके लिए भी, 
अपने बसे बसाये, उस नीड़ को त्यागना।
एक-एक तिनका को जोड़-जोड़ कर, 
बड़े परिश्रम से, जिसको बनाये थे वे, 
उम्मीद की उन्नीदीं सी छाया थी, सासों में, 
मन में सृजन की नवीन अभिलाषा थी। 
माँ-बाप के कुटिया को वीरान करके, 
तभी वे निकल पड़े थे, अनजान सफर को। 
आये थे तो रिक्त थी झोली, कुछ नहीं था हाथों में, 
बस अभिलाषा के सूक्ष्म सपनें, सरसराती थी सांसों में। 
जननी और जन्मभूमि की विरह वेदना, 
भेद न पायी, उनके इरादों की मजबूती को। 
लगन, निष्ठा और तत्परता थी उनके मन में, 
तभी पनपी थी, कुछ भी करने की लालसा । 
मंजिल पाने की प्रबल परीक्षा की घड़ी में भी, 
वे तैयार थे, सब हँसते हुए झेलने व सहने को । 
उम्मीदों का ठिकाना बना, अनजान शहर के वासी बने, 
रहने लगे थे, अपने नये रैन बसेरा के छावों में। 
पत्नी और बच्चों के जिम्मेदारी की, बोझ थी उन पर भारी, 
पेट को रोटी व तन को वस्त्रों की,दरकार बहुत थी ज्यादा। 
तभी तो अभिलाषाओं को पूरी करने की जद्दोजहद में, 
वे मेहनत-मजदूरी में डूबकर, खून पसीना बहाने लगे। 
सुख चैन से सोते थे, क्योंकि मेहनत का ही वे खाते थे, 
भेजकर अपनी कमाई, वे माँ-बाप की सुधि भी लेते थे। 
आयी जग में नयी आपदा कोरोना, जो थी सब पर भारी, 
लाॅकडाउन में बंद हो गया, काम-धन्धा और आना-जाना। 
नहीं बचा कुछ करने को, लाॅकडाउन के गहन-गम्भीर पल में, 
टूट गया रैन बसेरा उनका, बिना काम हो गये वे पस्त। 
चारों तरफ की विपदा ने, जब घेर लिया तन-मन-धन को, 
भय और विवशता ने, कर दिया मन को आहत व घायल। 
तब माँ की कुटिया ही याद आयी,बचा वहीं अन्तिम आसरा, 
चल पड़े डगर पर गिरते-पड़ते,नहीं मिला समर्थ का सहारा। 
राह दुर्गम व दुरुह था, यातायात का नहीं था, कोई साधन , 
चलने लगे, पांवों के बल पर, उम्मीद व श्रम का जोर लगाकर। 
भूख-प्यास से व्याकुल थे, पर थमना उनके वश में नहीं था, 
पैदल चलने का जोश दिखला दिया, कामगारों की टोली ने। 
 टूट गई हिम्मत सारी, हो गये जब पूरी तरह पस्त व अशक्त, 
आत्मा बची, न शरीर बचा, तब हो गये वे निश्तेज-निढाल। 
सारी इच्छा-अनिच्छा सब छूट गया, मुट्टी हो गई खाली, 
विवशता व मजबूरी की मार, पड़ गई जब बहुत ही भारी। 
छोड़कर मझधार में सबको,कुछ कूच कर गये वे दुनियाँ से, 
लील गया कोरोना ने बहुतों की, सुख-समृद्धि व जीवन- लीला।  
कुछ तो पहुचँ गये मंजिल तक, मिलकर खुशियाँ बटोरे, 
पर कुछ जो पहुचँ न पाये, अपनी मंजिल के द्वार तक। 
जन्मभूमि को नमन कर, मिट गये वे मातृभूमि के आगोश में , 
कामगारों के नवनिर्मित सपनें, धूलधूसरित हो विलीन हो गये।

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