ठेस से मिली सीख (बाल कहानी)

स्कूल की छुट्टी हुई तो बच्चों के चेहरे खिलखिला उठे। ये खुशी  प्रतिदिन की खुशी से अलग थी, क्योंकि आज स्कूल में बताया गया था कि कल मध्यान्तर के बाद कठपुतलियों का रोमांचक प्रोग्राम होगा। बच्चों को यह समाचार अपने माँ-पापा को सुनाने की जल्दी थी। इसलिए वे आपस में होहल्ला और बातें करते हुए कक्षा से बाहर निकल रहे थे।
                 कक्षा पाँच में पढ़ने वाला मयंक भी कठपुतलियों के नाच के कारण बहुत उत्साहित था। अतः यह खुशखबरी अपनी माँ को देने के लिए स्कूल बस से उतरते ही वह दौड़ता हुआ घर के अंदर गया और माँ को ढ़ूढ़ने लगा। पर उसे माँ कहीं दिखी नहीं। तब वह पापा से बोला," पापा, मम्मी दिख नहीं रही है। वह कहाँ है?"
मयंक के पापा बोले," तुम्हारी नानी की तबीयत अचानक खराब हो गई तो तुम्हारी माँ नाना के घर गई है।"
माँ की अनुपस्थिति में मयंक काफी निराश हो गया। वह दुखी मन से कमरे में जाकर अपना बस्ता रखा। फिर अनमने ढ़ंग से बिस्तर पर लेट गया। मयंक की बड़ी बहन मोहिनी मयंक को कपड़े इत्यादि सही ढ़ंग से रखने को बोली तो मयंक चिड़चिड़ा कर जवाब दिया," दीदी, अपना काम करो। मुझे परेशान करने की कोशिश मत करना।" यह सुनकर मोहिनी बुदबुदाती हुई अपने काम में लग गई।
काफी देर इधर-उधर बिस्तर पर लोटने के बाद मयंक कपड़ा बदला और जूता-मोजा उतारकर बेड के नीचे सरका दिया। नाश्ता करके वह रोहन के साथ खेलने लगा। खेलने-कूदने में वह इतना व्यस्त हो गया कि उसे अन्य कामों की सुध नहीं थी। खेलने के बाद रात का खाना खाकर वह सो गया।
दूसरे दिन मयंक की नींद देर से खुली। उठकर उसने मोहिनी से अपने काम में मदद मांगा तो मोहिनी बोली," अपना काम स्वयं करो। मेरे पास समय नहीं है।"
स्वयं को अकेला महसूस करने वाले मयंक को अपने गृहकार्य की चिंता सताने लगी। तब वह किताब-कापी लेकर काम करने बैठ गया। अभी वह सवाल हल कर रहा था कि उसे यह महसूस हुआ कि उसके स्कूल का समय हो गया। वह जल्दी से मंजन करके तैयार होने लगा। तैयार होने के लिए उसे अपना कोई सामान मिल नहीं रहा था। अव्यवस्थित ढ़ंग से फैले कपड़ों को जब उसने ढ़ूढ़ा तो उसे सिलवटे पड़ें कपड़ें मिले। वह उन्हीं कपड़ों को बुझे मन से पहनने लगा।
मयंक का जूता-मोजा भी अलग-अलग पड़ा था। जैसे-तैसे किसी तरह कपड़े पहनकर वह जूता-मोजा बेड के नीचे से ढ़ूढ़ निकाला। अभी वह जूता पहन ही रहा था कि उसे बस की पों-पों आवाज सुनाई पड़ी। किताब-कापी को बैग में भरने और डाइनिंग टेबल से टिफिन बाक्स उठाने में उसे काफी विलम्ब हो गया। मेज पर पड़े नाश्ता को एक नजर देखते हुए बाहर की तरफ भागा। लेकिन बाहर आते ही उसे घोर निराशा हुई क्योंकि बाहर मोड़ तक जाते ही उसे पता चला कि बस वहाँ से जा  चुकी थी।
बस छूटने का दुख मयंक को बहुत हुआ। वह दुखी मन से घर लौटकर बाहर लॉन में ही बैठ गया। अब वह सोचने लगा कि प्रतिदिन तो उसे तैयार होने में इतनी असुविधा नहीं होती थी, जितनी असुविधा उसे आज हुई। काफी सोच विचार के बाद उसे समझ में आया कि स्कूल से आते ही माँ उसे बार-बार सामान को सुव्यवस्थित ढ़ंग से रखने के लिए क्यों टोकती थी? शायद माँ इसीलिए टोकती थी कि उसे दूसरे दिन तैयार होते समय परेशानी न हो, पर वह तो उनकी बातों को अनसुनी करके अटपटे ढ़ंग से समान को फैलाकर खेलने भाग जाता था। खेलकर आने पर माँ होमवर्क भी करा देती थी। दूसरे दिन जब वह तैयार होता तो उसे अपना सभी सामान एक जगह और व्यवस्थित मिलता था। मयंक को माँ पर गर्व होता और वह खुशी-खुशी तैयार हो कर स्कूल चला जाता।
मयंक को आज स्कूल छूटने का बहुत दुख हुआ, पर उससे ज्यादा दुख इस बात का भी हुआ कि वह अभी तक माँ की आज्ञा का महत्व उसे समझ में नहीं आता था इसलिए हमेशा उलंघन करता था। उसके स्कूल में आज  कठपुतलियों का नाच होने वाला था। मयंक को कठपुतलियों का डांस बहुत पसंद था। वह उत्साहित होकर इस दिन की प्रतीक्षा भी बेसब्री से कर रहा था। पर अपनी ही लापरवाही के कारण उसका मनपसंद कठपुतलियों के डांस का प्रोग्राम छुट गया। मयंक सोच-सोच कर व्याकुल था कि सभी बच्चे डांस देखकर आनन्दित और रोमांचित हो रहे होंगे।
वह दुखी मन से घर के अंदर आया। मयंक को अपनी लापरवाही और माँ की नसीहतों को न मानने की अपनी आदत के कारण ठेस लगी। इस समय उसे माँ की याद आने लगी तब वह फूट-फूटकर रोने लगा। रोते-रोते मयंक कब सो गया ,उसे पता भी नहीं चला। मयंक के पापा कमरा में आये तो उन्हें यूनिफॉर्म में सोते मयंक को देखकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा, मयंक उठेगा तो उसी से पूछ लेंगें।
मयंक की नींद खुली तो उसने अपने लापरवाही के किस्से अपने पापा को बता दिया। स्वयं की गलती से मिली सीख ने मयंक को सतर्क कर दिया। उसके पापा ने कहा,"बेटा, समय की महत्ता बहुत बड़ी चीज होती है। जो सही समय पर अपना काम सुचारु रुप से करता है, वही अपने काम में सफल होता है।"
  मयंक भी समय की महत्ता को समझ चुका था। उसने सबसे पहले अपना कमरा साफ किया, फिर अपने किताब-कापियों को व्यवस्थित ढ़ंग से रखने के बाद वह पढ़ने बैठ गया। पढ़ कर उठा तो लंच करके सो गया। उसे माँ के बिना पूरा घर सुना लग रहा था। अभी तो पहला दिन था। न जाने माँ के बिना उसे कितने दिन अकेले रहना पड़ेगा। मयंक ने सोच लिया था कि अब वह अपने कामों के लिए माँ पर पूर्ण रुप से आश्रित नहीं रहेगा।
शाम को मयंक का दोस्त विभव आया। विभव उत्साहित होकर स्कूल में कठपुतलियों के डांस से आनन्दित होने की पूरी घटनाओं का विवरण सुचारुरुप से मयंक को सुनाया और ऐसे महत्वपूर्ण वाले दिन उसके अनुपस्थित होने का कारण पूछा तो मयंक ने अपनी आपबीती विभव को सुना दिया। विभव के जाने के बाद वह अपने विचारों में तल्लीन हो गया और यह विचार करने लगा कि आगे वह अपने कामों को कैसे करेगा ताकि उसका सभी काम  सही समय पर पूरा हो सके।
माँ के बिना पंद्रह दिन का समय उसके अपने व्यवस्थित होने के लिए बहुत था। इतने दिनों में उसमें काफी परिवर्तन आ चुका था । अब वह अच्छा बच्चा बन चुका था। वह अपना सभी काम सही समय पर पूरा करता और व्यवस्थित ढ़ंग से रहता।
माँ जब वापस आई तो मयंक में आये परिवर्तन को देखकर वे अचम्भित हो गई। तब मयंक ने अपनी आप बीती सारी घटनाओं को विस्तार से माँ को बताकर आगे से ऐसी लापरवाही न करने का संकल्प दुहराया तो माँ को आश्चर्य हुआ क्योंकि वह मयंक को जो सिखाना चाहती थी, वह बार-बार समझाने पर भी मयंक सिखता नहीं था। आज जब मयंक को सब कुछ खुद झेलना पड़ा तो उसमें काफी समझदारी आ गई। अपने लाडले में आये समझदारी और व्यवस्थित तरीक़े से रहने पर खुश होकर माँ उसे प्यार से गले लगा ली और ढ़ेर सारा प्यार लुटाने लगी।

No comments:

शंखनाद (कविता)