लाॅकडाउन महराज की जय हो (व्यंग्य)

लाॅकडाउन महराज की जय हो (व्यंग्य) 
पति-पत्नी की गिटपिट अक्सर कालोनी वाले सुनते थे। पर इसके लिए रश्मि करे तो क्या करे? आॅफिस से आते ही बाहर दोस्तों के साथ गप्पे मारने को आतुर पति सौरभ को वह रोकती, टोकती और आराम से चाय पीने की सलाह देती तो वह मानते नहीं थे। रश्मि को चाहे इसके लिए पति की बेकार की बातें सुननी पड़े तो वह सुन लेती थी और यदि तू-तू, मैं-मैं भी करना पड़ता तो वह भी वह कर लेती थी। क्योंकि उसके पति सौरभ के पांव घर में जल्दी टिकते नहीं थे। और रश्मि उन्हें यह जतलाना और एहसास कराना चाहती थी कि घर के प्रति भी उनका कुछ कर्तव्य बनता है। जिसे निबाहना उनकी भी जिम्मेदारी बनती है। पर स्वभाव से लापरवाह सौरभ के घुमक्कड़ी और गप्पबाजी के नीयत से रश्मि कुड़बुड़ाती थी, लड़ती थी, पर वह उन्हें समझा नहीं पाती थी।
     रश्मि के मनोभावों से लापरवाह सौरभ भी झक्की कम नहीं थे। आॅफिस से आते ही बाहर दोस्तों से मिलने की उन्हें इतनी जल्दी रहती कि यदि चाय बनने में थोड़ी देर हो जाए तो वे रश्मि पर खिजतें और बड़बड़ाते हुए बाहर निकल जाते कि इस औरत को जाने कब अक्ल आयेगी। पत्नी होने का रौब तो झारती है, पर आॅफिस से थके-हारे आये पति को समय से जल्दी चाय बनाकर भी नहीं पिला पाती।
चाय बनने पर रश्मि जब देखती कि सौरभ गायब है, तब वह तिलमिलाती हुई सौरभ को ढ़ूढ़ने घर से बाहर भी निकल पड़ती। बाहर जाकर देखती, तो पाती थी कि उसके पति दोस्तों के साथ गपशप करते हुए कहकहे लगाने में बहुत व्यस्त और मस्त हैं। पति को बुलाने की हिम्मत वह जुटा नहीं पाती तो खिजती हुई बुदबुदाने लगती,' अब मैं अपने प्यारे पति को क्या कहूँ, कैसे समझाऊं कि गृहस्थी का बोझ अब अकेले उठाये उठता नहीं है, इसलिए कभी-कभार थोड़ी मदद ही कर दो। पर ये सुने तब तो कहूँ। गृहस्थी का सारा बोझ मेरे सर मढ़कर दोस्तों में कितने मस्त है। शिकायत करो तो लड़ने को तैयार हो जाते है। गुस्सा दिखाओ तो रात में चिकनी-चुपड़ी बातें करके बहला-फुसला लेते है। जरा भी परवाह नहीं करते, मरु या जीयूं। अब शिकायत करु भी तो किससे करु? कोई सुनने वाला भी नहीं है।'
रश्मि बिना चाय पीए बेमन से सब्जी काटने बैठ जाती है। उसके टप-टप टपकते आँसुओं का कोई मोल किसी के पास नहीं था। यही सोच कर वह अपने गृहस्थी और बच्चों में अपने को व्यस्त करके अपना काम शुरु कर देती।
       अचानक एकदिन कोरोना वायरस के भंयकर वैश्विक संक्रमण रोकने के लिए लाॅकडाउन की घोषणा सरकार की तरफ से हो गई। लोगों का घर से निकलना मना हो गया। बाहर निकलने पर सख्ती होने लगी। रश्मि भी पति को बार-बार समझाती थी कि घर में रहो, घर में रहो। पर अल्हड़ और घुमंतू सौरभ लाॅकडाउन के नियम-कानून को मानने और अमल करने को तैयार नहीं थे। वे लाॅकडाउन को धत्ता बजा कर बाहर निकल जाते। क्योंकि वे वही करते जो उनका दिल करने को तत्पर होता। अपने को घर में क्रियाशील और सुरक्षित रखने की चुनौती का संदेश लेकर लाॅकडाउन की घोषणा अपनी जगह जारी था, कोरोना वायरस से संक्रमण फैलने का खतरा और डर अलग था पर मनमौजी सौरभ का घुमन्तू मन बाहर निकलने को, दोस्तों से गपशप और कहकहे लगाने को अपनी जगह और अधिक उत्सुक और आतुर था।
वैश्विक महामारी के ऐसे विषम परिस्थितियों में लाॅकडाउन की घोषणा के बाद भी घर से बाहर जाने को तड़पने वाले सौरभ अक्सर मौका मिलते ही मुँह उठाकर बाहर निकल जाते। पर मौके की नाजुकता को न समझने वाले सौरभ को अब अक्सर मुँह की खानी पड़ती थी। क्योंकि वही दोस्त राहुल जो उनके साथ कहकहे लगाने में नम्बर वन पर  था, वही उन्हें देखते ही मुँह छुपाकर जल्दी से अपने घर में घुस जाता। जब वे उसे पुकारते तब वह खिड़की से मुँह निकाल कर वहीं से जोर से चिल्लाता ,"अरे यार, कहाँ और क्यों बाहर निकले हो? कोरोना वायरस से डरो। सोसल डिस्टेन्डिंग बनाओ। जल्दी से घर वापस जाओ और मास्क लगाकर घर में ही मन बहलाओ।"
सौरभ को राहुल से ऐसी उम्मीद नहीं थी। पर वे निराश नहीं हुए। घर वापस जाने के विपरीत वे दुगने उत्साह से दूसरे दोस्त की तलाश में आगे बढ़ गये। आगे बढ़ते ही जब रास्ते में मुँह पर मास्क लगाये उन्हें उनका पड़ोसी कम, दोस्त ज्यादा रहे मिस्टर शरद मिल गये तो सौरभ के आनंद की कोई सीमा नहीं थी। शरद बाजार से सब्जी लेकर लौट रहे थे। सौरभ खुशी मन से आगे बढ़कर हाथ मिलाने को आतुर हाथ बढ़ाते हुए बोले," अरे दोस्त बड़ी खुशी हुई तुमसे मिलकर। कम से कम एक तुम ही तो ऐसे मिले, जो मेरी तरह बहादुर है। वाह भाई वाह, मान गये तुम्हें भी, जो लाॅकडाउन के डरावने घोषणा के बाद भी डरे नहीं और बाहर निकल आये। एक राहुल को देखो। डरपोक बना घर में छुपा बैठा है। बुजदिल कहीं का। एक अदृश्य वायरस का इतना खौफ कि पुराने दोस्त को पहचानना ही भूल गये। "
"अरे रे रे दोस्त, वहीं ठहरो, पास में मत आना। जानते नहीं, लाॅकडाउन का समय है। सोसल डिस्टेंडिंग का पालन करना है। मैं सब्जी लेने जरुरी काम से निकला था। मैं तुम्हारी तरह बेवकूफ नहीं हूँ जो फालतू मटरगश्ती और बेवजह कहकहे लगाने के लिए टहलू। मैं देश में होने वाली किसी भी घटना से अनजान नहीं हूँ। इसलिए उसका पालन करना अपनी जिम्मेदारी समझता हूँ। देश में कोरोना वायरस के कारण इतनी बड़ी मुसीबत आयी है, तो तुम कुछ सोचने समझने के बजाय उसकी अवहेलना करने पर तुले हो। अरे पढ़े-लिखे होने का कुछ तो मान रखों। तुम्हारे जैसे बेवकूफों के लिए ही कहा गया है---पढ़ा-लिखा बेवकूफ। मुँह पर मास्क नहीं है। नमस्ते के बजाय हाथ मिलाने को हाथ बढ़ा रहे हो। ढीठ गबरु और बेकार कहीं के। अरे घर में रहोगे तो सुरक्षित रहोगे। वरना कोरोना वायरस से बचाव कैसे सम्भव होगा।" सौरभ की नादानी पर शरद क्रोध से तिलमिला कर कोस रहा था। पर अपने स्वर को थोड़ा संयम करके बोला क्योंकि सौरभ उसका जिगरी दोस्त था,जिसके साथ उसका प्रतिदिन का उठना-बैठना था।
      "अरे यार,तुम भी किनके बहकावे वाली बेकार बातों में फँसे हो। मैं कम से कम तुम्हें तो समझदार समझता था, पर तुम भी निकले वहीं घात के तीन पात।" सौरभ झिझकते हुए अपने बढ़े हुए हाथ को नीचे करते हुए बोला।
  सौरभ की बात सुनकर शरद दुखी हो गया। बोला,"दोस्त, जब तुम्हारे जैसी पढ़ी-लिखी समझदार जनता ऐसी नादानी भरी बातें करेंगें तो हम दूसरे गरीब मजदूरों और कामगारों को क्या समझा पायेंगे। उनसे क्या उम्मीद करेंगें। अब तुम चुपचाप घर जाओ। सेनेटाॅइजर से हाथ खूब साफ करना और यदि अब कभी मजबूरी में निकलना पड़े तो मास्क जरुर लगाकर निकलना।" यह कहकर शरद मुड़ा और तेजी से अपने घर में घुस गया। 
उसके जाने के बाद अकेला मायूस सौरभ चुपचाप घर लौटने पर विवश हो गया। आगे जाने और किसी और की जलालत भरी बातें सुनने की अब उसके पास हिम्मत नहीं बची थी। घर आकर सबसे पहले उसने अपने हाथ को अच्छी तरह साबुन से साफ किया फिर सेनेटाॅइजर से हाथ को मलता हुआ धम्म से बैठकर टीवी खोलकर समाचार सुनने लगा ।
सौरभ जो कभी टीवी के महत्वपूर्ण समाचार पर ध्यान नहीं देता था.. वह समाचार में ध्यान बटाने लगा।
परिस्थितियाँ मानव को विवश कर देती है कि वह उसकी बातें माने और कड़ाई से उसका पालन करे। समय की पुकार को अनसुनी करने वाले और उसकी बातों से मुँह मोड़ने वाले सौरभ को भी आखिर वही करना पड़ गया जो इस समय समय के अनुकूल समय की उचित मांग थी।
उसी समय रश्मि कमरे में आ गई। सौरभ को अकेले खामोश बैठा देखकर रश्मि आश्चर्य में पड़ गयी। अचानक उसके मुँह से बोल फूट पड़े। वह बोली,"अरे वाह, आज बाहर क्या कोई मुर्गा नहीं फँसा जो जबरन तुम्हें घर आकर टीवी में सर खपाना पड़ गया।"
आज रश्मि की व्यंग्य वाणी को सौरभ पचा गया। वह कुछ बोला नहीं। तभी अचानक रश्मि उसके गले में बाहें डाल दी। काम की बोझ से अजलस्त रश्मि का बदन शीथिल लगा तो सौरभ चौंककर खड़ा हो गया। वह रश्मि के चेहरे को हाथों में लेकर बोला," अरे रश्मि, तुम बहुत थकी-थकी सी लग रही हो। तुमने मुझे पहले बताया क्यों नहीं?"
"अरे, ये काम के बोझ के कारण थकान है। अभी ठीक हो जायेगा।" रश्मि बोली।
"अरे बैठो। डरना नहीं। मैं अभी अदरक-कालीमिर्च वाली चाय बनाकर तुम्हें पिलाता हूँ तभी तुम्हारा थकान मिट जायेगा।"
सौरभ तेजी से रसोईघर में गया तो उसने देखा रसोईघर में अब भी कुछ जुठे बरतन पड़े है। सौरभ बाहर आकर रश्मि से बोला, "रश्मि, क्या कामवाली राधा अभी आई नहीं। "
" अरे मिस्टर। कहाँ हो? कुछ घर की सुधि भी रक्खा करो। राधा तो तब से नहीं आ रही है जब से लाॅकडाउन हुआ है।"
" ओह मैं भी कितना लापरवाह हूँ जो मुझे घर में क्या हो रहा है इसकी फिक्र ही नहीं रहती। खैर अब ये उँट आ गया है तुम्हारे पहाड़ के नीचे। अब ये तुम्हारी हर बात मानेगा और तुम्हारी मदद करेगा। तुम बहुत अच्छी हो। तुम्हारी थकान जल्दी ठीक हो जायेगा। तुम यहीं आराम से बैठो। मैं अभी तुम्हारे लिए गर्मागर्म तड़के वाली चाय लेकर आता हूँ।"
सौरभ की हड़बड़ाहट देख रश्मि को हँसी आ गई। जो कभी काम न किया हो, वह काम देखेगा तो बौखलाएगा ही। सौरभ रसोईघर में चला गया तो रश्मि प्रसन्नचित्त हो गई। काम की अधिकता का बोझ उतर गया। पति के हाथ की गर्मागर्म चाय की उम्मीद में वह हाथ उपर करके बोली," जय हो लाॅकडाउन महराज की। काम में सहयोग की जो भावना मैं उम्मीद में संजोए बैठी थी और जिसे मैं सौ बार नाक रगड़ रगड़कर भी अपने पति को सिखा नहीं पाई थी, वह लाॅकडाउन महाराज, तुमने एक झटके में अपनी माया से उन्हें सिखने का मौका दिया। तुम्हारी भूरी-भूरी  जितनी भी प्रशंसा की जाए.. वह कम ही है। तुम धन्य हो लाॅकडाउन महराज। तुम्हारी बारम्बार जय हो। हमारे जैसी महिलाएं तुम्हारी महत्ता को हमेशा याद रखेंगी।"

 


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शंखनाद (कविता)