धूर्त लोमड़ी की खुल गई पोल (बाल कहानी)

कनक वन की गिल्ली लोमड़ी एकदिन घुमते-घुमते चंदन वन में पहुचँ गयी। चंदन वन की हरियाली और शांत वातावरण गिल्ली के मन को लुभाने लगा। दो-चार सीधे-साधे वनवासियों से मिलने के बाद जब गिल्ली को पता चला कि यहाँ आसपास कोई स्कूल नहीं है तो गिल्ली को बहुत खुशी हुई कि वह यहाँ के लोगों को मूर्ख बनाकर ढ़ेर सारी कमाई कर सकती है। कनक वन में गिल्ली की धूर्तता की दाल गलनी बंद हो गई थी, इसलिए उसे चंदन वन बहुत अच्छा लगा।
गिल्ली शहर से जानवरों और पशु-पक्षियों के जरुरत के अनुसार ढ़ेर सारा सामान लेकर आई और  चंदन वन में बहुत बड़ी दुकान खोल ली।
        गिल्ली लोगों को लुभाती, प्रलोभन देती, बहकाती पर कोई उसके दुकान पर जाना नहीं चाहता था क्योंकि चंपक वन स्वयं सक्षम एवं समृद्ध था। उसका हर-भरा माहौल सबकी जरुरतों को पूरा करने वाला था। सभी घूमकर खाते-पीते और एक दूसरे से मिलकर मस्ती मारते और खुश रहते। उन्हें अपने वन में अपनी दिनचर्या और रहन-सहन में सकून मिलता था। उन्होंने इससे पहले कभी ऐसी दुकान देखा नहीं था, इसलिए वे उससे दूर ही रहते।
पर धूर्त लोमड़ी तो अपनी चालाकी का जाल फैला कर लोगों को मूर्ख बनाना चाहती थी। इसलिए वह जानवरों और पशु-पक्षियों के बच्चों को मुफ्त में सामान बाँटने लगी। धीरे-धीरे बच्चे उसके जाल में फँसने लगे। अब वह कभी बच्चों को मुफ्त में देती तो कभी उनसे पैसे की फरमाइश करने लगी। कुछ दिनों बाद उसने मुफ्त में सामान देना बंद कर दिया।
बकरी और घोड़े को बिना मेहनत किए हरी मुलायम घास मिलने लगी, गाय भैंस को चारा। मिट्ठू को हरी मिर्च तो बंदर को ढ़ेर सारा फल और शेर, गीदड़ और सियार को मांस गिल्ली के दुकान पर आसानी से मिलने लगा। गिल्ली के इच्छा की पूर्ति होने लगी। वह चंदन वन के जानवरों को मूर्ख बनाकर ढ़ेर सा पैसा कमाना चाहती थी इसलिए वह सामान कम तौलती पर हिसाब बढ़ा कर बताती। चंदन वन के अनपढ़ जानवर अपना हिसाब भी जोड़ नहीं पाते थे।
धीरे-धीरे चंदन वन के लोग आलसी बनने लगे। यही कारण था कि गिल्ली की दुकान चल निकली। धीरे-धीरे उसके दुकान से सामान लेने के अभ्यस्त होने लगे। अब उनका घुमना-फिरना और एक दूसरे से मिलना कम हो गया। लोगों को भूख लगती तो झट से गिल्ली की दुकान से खाने का सामान मगाँ लेते और खा-पीकर घर में पड़े रहते। चंदन वन में आये इस परिवर्तन की तरफ किसी का ध्यान आकर्षित ही नहीं हुआ क्योंकि इस वन का होनहार चप्पू खरगोश अपने नानी के घर गया हुआ था। चप्पू नानी के घर रहकर पढ़लिखकर होशियार बन गया था। वह अपने वन में स्कूल खोलना चाहता था। पर किसी ने उसका समर्थन नहीं किया। यही कारण था कि यहाँ के लोग मूर्ख आलसी और कामचोर बने रहे और गिल्ली उन्हें ठग कर दिन दुनी रात चौगुनी के दर से अपने मोटापा को बढ़ाने लगा।
चप्पू खरगोश जब अपने नानी के घर से घुमने के बाद अपने वन आया तो उसे यहाँ के बिगड़े हालात का पता चला। दो ही चार दिनों में ही उसे गिल्ली की धूर्तता का अंदाज लग गया। वह अपने साथियों को समझाता और गिल्ली के दुकान न जाने को कहता तो लोग उसके बात को खिल्लियों में उड़ा देते।
चप्पू सोच में पड़ गया कि वह कैसे अपने वनवासियों को इस धूर्त गिल्ली से छुटकारा दिला सके।
चप्पू अपने साथी मंकू बंदर को तैयार किया और गिल्ली के दुकान पर पहुचँ गया और समानों की सुचि गिल्ली को पकड़ाकर बोला,"समान पैक करके रख देना मैं अभी आता हूँ।" चप्पू के जाने के बाद गिल्ली साथ काम करने वाले जीतू से बोला," कैसा मूर्ख ग्राहक फँसा है जो मुझपर विश्वास करके चला गया। अब इससे ढ़ेर सारी कमाई करनी है। तुम परे हटो। इसका सामान मैं ही तौलूंगा।" यह कहकर गिल्ली सामान तौलने लगा। गिल्ली जानबूझकर प्रत्येक सामान को तौलने के बाद उसमें से थोड़ा निकाल लेता था।
शाम को चप्पू हड़बड़ाता हुआ आया। आते ही बोला," कहाँ है लिस्ट और मेरा सामान? हिसाब कितना हुआ? जल्दी बताओ। मुझे जल्दी है।"
गिल्ली पहले से ही हिसाब बनाकर बैठा था इसलिए जल्दी से बताकर रसीद पकड़ा दिया।
चप्पू रुपया निकालने लगा। उसी समय इंस्पेक्टर हम्पी हाथी के साथ बहुत से वनवासी गिल्ली के दुकान को घेर लिए। दुकान पर आई मुसीबत को देखककर गिल्ली भागने वाला था कि लोगों ने उसे पकड़ लिया। सामान में घट तौली और हिसाब में गड़बड़ी के कारण हम्पी उसे पकड़कर थाने ले गया और जेल में बंद कर दिया।
चप्पू बोला," देखा साथियों, मैं तुमसे कहता था कि स्कूल जाकर शिक्षित बनों पर तुम लोग मेरी बात को हँसी में उड़ा देते थे। आज यदि तुम पढ़े होते तो तुम्हारी कमजोरी का फायदा यह गिल्ली उठा नहीं पाता।"
सारे जानवर और पशु-पक्षी सर झुकाकर खड़े थे। उन्हें अपने गलती का एहसास हो गया। वे एकसाथ चिल्लाकर बोले," अब हम भी पढ़-लिख कर बुद्धिमान बनेंगे, ताकि आगे से हमें कोई मूर्ख न बना सकें।
चप्पू खुश हो गया कि गिल्ली के कारण उसके साथियों को अक्ल तो आ गयी।          

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