सेतु (कहानी)

बीमार वंशराज अस्पताल में भर्ती थे। पत्नी कूकी अपनी परिस्थितियों को तल्लीनता, तत्परता और निष्ठा से झेलती हुई पति सेवा में तल्लीन थी। उपर से सब कुछ शांत व सरल लग रहा था पर एकाकीपन के दंश ने धीरे-धीरे उन्हें खोखला कर दिया था। इसलिए वे मन ही मन में व्यथित थे। वे उम्मीद करते तो किससे करते क्योंकि उम्मीद की कड़ी को उन्होंने स्वयं तोड़ा था। बेटा के परिवार से दूर एकांतवास का निर्णय उनका स्वयं का अपना निर्णय था।  स्वाभिमान और अकड़ ने मन के पीड़ा की पुकार नहीं सुनी इसलिए उन्होंने अपने बीमारी के समाचार को फैलाने से रोक दिया। फिर कोई आता भी कैसे? अतः ऐसे में किसी के आने का प्रश्न ही नहीं था।
परंतु एकदिन अचानक अजलस्त पड़े वंशराज की आँखें खुली तो सामने पोता अनुरोध को देखकर वे चौंक गये। ये यहाँ कैसे? वे विस्मय से कूकी को घूरने लगे। तभी अनुरोध आकर उनसे लिपट गया।
इस अप्रत्याशित,अनहोनी,अपरिहार्य,उत्साहवर्धक खुशी के माहौल में वे तृप्ति के सागर में गोते लगाने लगे। उनकी शक्तिहीन,शिथिल अंगुलियाँ आलिंगनबद्ध अनुरोध के पीठ पर डोलती हुई इस सत्यता को आत्मसात कर रही थी कि यह अनुरोध ही है। सुखद अनुभूति वाले पल में बाबा-पोता दोनों आकंठ तक डूबे थे।
अचानक भय वाली तरंगें वंशराज के मन में सरसराती हुई घुसी तो डरकर चौंक गये, बोले," बेटा, क्या माँ से पूछ कर आये हो?"
प्रश्न तीर की भांति चुभ गई। पर अनुरोध ने सहजता से  उनके हाथ को थामकर सहलाते हुए विश्वास भरे अंदाज में बोला,"बाबा, क्या अब भी मैं आपको माँ का आँचल पकड़ कर माँ के पीछे-पीछे भागने वाला अनुरोध लगता हूँ। नहीं-बाबा नहीं, अब मैं बड़ा और समझदार हो गया हूँ। मैं अकेला भी नहीं हूँ। उठिए, देखिए, आपसे मिलने और कौन आया है?"
 वंशराज ने नजरें घुमायी  तो अनुरोध मोहिनी को आगे करके बोला," आपकी पौत्रबहु आप लोगों के आशीर्वाद के अनुकम्पा से अनुग्रहीत होने आई है।"
अनुरोध-मोहिनी के चरण स्पर्श से वंशराज-कूकी के पोर-पोर पल्लवित हो गये।
अचानक नर्स की आवाज सुनाई पड़ी," मरीज के पास इतनी भीड़ क्यों है? निकलिए, बाहर चलिए।"
"सिस्टर, इधर देखिए, ये मेरा पोता अनुरोध और उसकी पत्नी मोहिनी है।" कूकी चहककर बोली तो नर्स रुककर देखने लगी,बोली,"ओह, तो आप ही है इनके पोता। बहुत अच्छा किए जो आ गये। आप इनके संजीवनी है और इसी संजीवनी की इन्हें इस समय सख्त जरुरत थी।" अपना काम करती हुई वह फिर वंशराज से बोली," बाबा, खुश हो। देखना,अब जल्दी ठीक हो जाओगे।"
धीरे-धीरे एक सप्ताह बीत गया। अनुरोध-मोहिनी की उपस्थिति ने संजीवनी जैसा असर दिखाया। वंशराज ठीक होकर घर आ गये।
  स्वस्थ व चैतन्य हुए वंशराज के मन की समग्र चेतना अनुरोध को देखकर कितनी ही भूली-बिसरी स्मृतियाँ बटोरने लगी। कभी इसी पोता के सामिप्य और सांनिध्नता को वे हरपल तरसते थे क्योंकि बहू मुक्ता इस मिलन में सदैव बाधक बनी रहती थी। यहीं कारण था कि पास होते हुए भी उनमें दूरियाँ निभानी पड़ती थी। आज वही पोता अपनी पत्नी के साथ इतनी सहजता और सरलता के उन्मुक्त भाव से उनकी सेवा में जुटा था, तो उनका आश्चर्यचकित होना लाजमी था।
यही प्रश उमड़ घुमड़कर उन्हें बेचैन कर रही थी कि अनुरोध यहाँ क्यों, कैसे और किसके कहने पर आया है? क्या बहू मुक्ता बदल गई है? या बेटा अनुराग ने अनुरोध को भेजा है। वैसे ये दोनों सम्भावनाएं सम्भव नहीं था। इसलिए यह सोचना बेकार था। क्या अनुरोध बिना किसी के अनुमति के यहाँ आया है? यह पहेली वंशराज के सोच से परे था।
अनुरोध ने अभी तक अपना पत्ता नहीं खोला था। परंतु वंशराज अपने सोच के दायरे से बाहर निकलना चाहते थे क्योंकि उनके अपने दिल में गहरी पैठ बनाये पुराने अनसुलझे यादों की गुत्थी कसमसाने और कुड़बुड़ाने के पश्चात अनुरोध की उपस्थिति में गुब्बारे के समान फूटना चाहती थी।
अतः पहल का मौका मिलते ही वे अनुरोध से बोले," बेटा, सच-सच बताना। तुमने यहाँ आने के लिए माँ से अनुमति लिया था? तुम्हारी  अनुपस्थिति से बहू मुक्ता कोहराम मचा देगी। जिसके चपेट में आने पर बेटा अनुराग बेहाल व परेशान हो जायेगा। मुझे उसकी चिंता ज्यादा है।"
"बाबा, आप क्यों सबकी चिंता करते है?  पापा अपने माहौल में जीने के अभ्यस्त हो गये है। आप सबकी चिंता छोड़कर मस्ती से रहिए।" अनुरोध लापरवाही से बोला।
वंशराज बोले," बेटा, तुम्हारी माँ की बात मानना तुम्हारे पापा की मजबूरी है। यदि वे ऐसा नहीं करते तो जी नहीं पाते। वे घर की सुख शांति के लिए खामोश रहना बेहतर औषधि समझते थे। लेकिन तुम्हें तो ऐसा नहीं करना चाहिए था।"
" बाबा, मैंने आकर कोई गुनाह नहीं किया है। आप ही कहते है सच को आँच नहीं लगती। फिर मैं क्यों डरु?" अनुरोध जोर देकर बोला। 
कूकी इन बातों को सुनकर डर गई। ये बाबा-पोता जाने क्या गुल खिलाने वाले है? इसलिए वह हस्तक्षेप करने आ पँहुची, बोली," बेटा, ये पल बातों में गँवाने का नहीं है। उठो नाश्ता करो। नाश्ता तैयार है।"
" दादी, अभी नाश्ता नहीं करना है।" अनुरोध कूकी के आग्रह को ठुकराकर अपने ही लय में बोला," बाबा, मैं पापा की मजबूरी समझ नहीं पाया। पर माँ ने आप लोगों के प्रति जहर बो कर हम लोगो की जिंदगी को त्रिशंकू की भांति अधर में लटका दिया। इसका कितना खराब असर हम पर पड़ा, यह माँ के समझ से परे था। हम दिल खोलकर रिश्ते की पूर्णता को जी नहीं पाये। कितना दुखदायी था हमारा बचपन? आप लोगो के रहते, हम कामवाली आंटी के संरक्षण में हो गये।"
" हाँ बेटा, इस परेशानी को समझकर भी मैं मजबूरी में कुछ कर नहीं पाया।" वंशराज कुछ सोचते हुए बोले।
बात बढ़ता देख कूकी घबड़ा गई। पारिवारिक अंदरूनी, वैचारिक वैमनस्यता का खुलासा नयी नवेली बहू मोहिनी के समक्ष हो, यह कूकी को मंजूर नहीं था। वह झटपट मोहिनी के सहयोग से नाश्ता लाकर रख दी और तमककर बोली," पुराने प्रसंगों का चिथड़ा उघारने पर क्यों तुले हो तुम दोनों? जो ढका है, उसे ढका रहने दो। खुलने पर बदबू फैलायेगा तो बहू पर दुष्प्रभाव डालेगा, इसलिए ख़ुशनुमा माहौल में खुशियों का फूल खिलाओ।"
अनुरोध उठा। वंशराज को नाश्ता पकड़ाकर फिर बैठ गया, बोला,"दादी, चिंता न कीजिए। मोहिनी इस परिवार की हिस्सा है। नये परिवेश में यदि आप सच को झुठलायेंगी तो प्रेम के बंधन के नींव मजबूत कैसे होगी? रिश्ते में मजबूती और प्रगाढ़ता तभी होगी, जब हम सच-झूठ का पर्दा हटाकर यथार्थ की दहलीज पर पांव पसारेंगें।"
कूकी के पारिवारिक प्रेम की चूलें  किसकी गलतियों व लापरवाहियों के कारण हिलें थे, यह वह आज तक समझ नहीं पाई। वह जिसको समझाती या चुप कराती वही उस पर बरसने लगता। पहले वह चुप हो जाती थी पर अब जो हो गया, वह हो गया। अब बिखरे परिवार के कटूटा का गंध न फैले, इसलिये वह फूट पड़ी और दोनों को चुप कराने लगी। 
परंतु कूकी की कभी किसी ने सुनी थी, जो आज सुनता। अनुरोध चुप बैठना नहीं चाहता था अतः दादी से बोला, "दादी, आज वर्षों बाद खुलकर कुछ बोलने का मौका मिला है। इसलिए मौके को गंवाने मत दीजिए। सही सोच से किया गया वार्तालाप नयी दिशा की राह दिखलाता है। इसलिए प्यारी दादी, आप हमें बोलने से रोकेंगी नहीं।" 
कूकी चुपचाप मोहिनी के साथ बैठ गयी। वह समझ गयी कि आज बोलने का नहीं, सुनने का दिन है। अतः वह सुनने लगी। 
अनुरोध आगे बोला," दादी, आप जानती नहीं है। माँ ने आप लोगो का जो बिगाड़ा सो बिगाड़ा, पर उनका कितना नुकसान हुआ इसका उन्हें उस समय गुमान नहीं था। वे अंधेरे कुएं में भटकती गलत दिशा में गोते लगाती रही। छलांग लगाकर कुएं से निकलना उनकी चाहत नहीं थी। तभी उन्हें अपने पैर में कुल्हाड़ी मारना नजर नहीं आया। उनके जिद, नखरें, प्रकोप जैसे गलत विचार धारा से त्रस्त पापा ने किसी तरह अपनी जिंदगी बसर कर ली,पर मैं अब सच्चाई समझ चुका हूँ । इसलिए मैं माँ के झांसे में पड़ने वाले नहीं हैं।"
" बेटा, वे तुम्हारे माँ-पापा है। तुम्हें उनका आदर करना चाहिए।" वंशराज अनुरोध को समझाते हुए बोले। 
अनुरोध बोला," मैं कब इंकार करता हूँ। मैं अब भी उनका उतना ही आदर करता हूँ जितना पहले करता था। पर किसी गलत निर्णय पर मैं चुप रहूँ, सहता रहूँ और आप लोग मनमानी करते रहे। यह अब मुझे बर्दाश्त नही।"
" बेटा, तुम्हारा यूं उखड़ना परिवार के लिए ठीक नहीं। तुम शांत मन से सोचो।" वंशराज शांत स्वर में बोले। 
" बाबा, आपने भी तो गलती की है। जैसे बेटा-बहू मानकर  आप उनकी कमियों को नजरअंदाज करते रहे उन्हें टोक और समझा नहीं पाये, पर वैसे सब करें यह मुमकिन नहीं है। उन्हें अपनी भूल का एहसास भी तो होना चाहिए। हम नयी विचारधारा, नयी सोच के बावजूद लकीर के फकीर बने रह जायेंगे। फिर समाज में सुधार कैसे होगा? नहीं बाबा, आप मुझे वैसा करने के लिए बाध्य नहीं करेंगे, जैसा आप लोगो ने किया।"
अनुरोध भावविभोर होकर उत्तेजित होने लगा तो वंशराज को अपनी गलती महसूस हुई, बोले," बेटा, कभी-कभी समझबूझ कर गलती हो जाती है। आदमी का बस नहीं चलता।"
" नहीं बाबा, घर छोड़ना आपकी भूल थी तो अपनी भूल पर पर्दा मत डालिए। आत्मविश्वास की कमी के कारण गलतियाँ होती है, तो उस गलती को सुधारा जा सकता है। हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना, कहाँ की समझदारी है।"
आज अनुरोध को कोई रोक नहीं सकता था। वह अपनी भड़ास निकालने पर तुला था, इसलिए वंशराज भी उसकी बात सुनने लगा।
अनुरोध बोला," बाबा, आप अच्छी तरह समझ लीजिए। आप और पापा की कमियों के कारण ही माँ शेरनी बनती गई। माँ को अपने धनोपार्जन का गुरुर था। कमाना और दिल खोलकर खर्च करने में ही महारथ हासिल करने को ही माँ अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझती थी, तभी मैं खिलौनों और खाने-पीने की चीजों से लदा रहता था। इसके अतिरिक्त कोई और कर्तव्य और जिम्मेदारी उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था।"
वंशराज समझाने के अंदाज में बोले," हाँ बेटा, स्वालम्बी बनना अनिवार्य है, पर स्वालम्बी होना गुरुर का आधार बने यह ठीक नहीं है। प्रेम के सुखद अनुभूति का स्वाद चखने की अपेक्षा अहं को सर्वोपरि करने की तमन्ना ही धूलधूसरित कर देती है। यही भटकाव का कारण बनती है।"
 वंशराज आगे बोले," पारिवारिक बंधनों और कर्तव्यों में ही प्रतिभा निखरती और सँवरती है। बहू मुक्ता अपने प्रतिभा का विस्तार परिवार में चाहती ही नहीं थी। अतः उन्हें अपने पति और बच्चे में ही सिकुड़ने और सिमटने में भलाई नजर आने लगी।"
अनुरोध बोला," हाँ बाबा, माँ यही चाहती थी। वे हमें सीमित दायरे में कैद करके सिर्फ अपने अधीन रखना चाहती थी। ऐसा न कर पाने की स्थिति में उनकी असन्तुष्ट भावनायें प्रबल अग्नि की भांति भभक उठती थी।"
कुछ सोचकर वंशराज बोले," एक बात और है बेटा, जो स्वयं को सर्वोपरि समझेगा, उसे बड़े बुजुर्गो की छत्रछाया स्वीकार नहीं होगी। दूसरी बात... पारिवारिक परिवेश में तुलनात्मक प्रवृत्ति ईर्ष्या व कुण्ठा को जन्म देती है। प्रतिभा सम्पन्न अपनी सास के गुणों को आत्मसात करने, समझने और उनसे तालमेल बैठाकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन जैसी घरेलू सम्बंधों की उपेक्षा करके अपनी जिद को ही  अपना अधिकार समझने लगी थी बहू मुक्ता। जिससे हम लोगो की बसी बसायी गृहस्थी और मानमर्यादा की चूलें हिलती नजर आने लगी। बेटा-बहू हम पर हाबी हो, यह हमें स्वीकार नहीं था। मैं अपने और कूकी के बने बनाये सम्मान का मानमर्दन नहीं होने देना चाहता था। इसीलिए आ गये बेटा-बहू से दूर एकांतवास में समय व्यतीत करने।"
" बाबा, मेरी एक बात समझियेगा। महत्वाकांक्षा की आड़ में आप दोनों ने अपने-अपने अहं और आत्मा की संतुष्टि और मनमानी अपने-अपने ढ़ंग से कर ली। पर क्या कभी आप लोगो ने  एक बच्चे के कोमल  मन की कोमल भावनाओं को समझने की कोशिश की, जो इन विकृतियों को स्वीकार न कर पाने की स्थिति में कितनी आहत व कुंठित होती थी। इसका आंकलन आप लोग कर ही नहीं पाये, फिर उसे नजरअंदाज करने जैसी भूल को आप स्वीकारेंगे भी तो कैसे? क्या मैं आप लोगों की जिम्मेदारी नहीं था। मेरी भावनाओं के कद्र के लिए आप लोग अपने अहं को ताक पर रखकर समझौता कर लेते तो क्या बिगड़ जाता। मैं बोल नहीं सकता था तो क्या हुआ, समझता खूब था। इसलिए गुनहगार आप सभी लोग है।"
कुछ ठहरकर वंशराज बोले," बेटा, जो हो गया, उसपर किसी का बस नहीं था।"
" यह आपकी भूल है, बाबा। माँ की जिद ने मुझे आपसे दूर कर दिया। पर मैं उस सुख-शांति को कैसे भूल सकता हूँ, जो मुझे आप लोगों के स्नेहिल समीपता से मिलता था। इसलिए मुझे माँ-पापा के साथ ही बाबा-दादी वाला वह नैसर्गिक स्वर्ग वाला सुख, प्यार के साथ ही साथ वह माहौल भी चाहिए, जो कभी-कभी आप लोगों की छत्रछाया में मुझे कभी-कभी नसीब होता था। पहले हम नासमझ थे, पर अब समझदार हो गये है, इसलिए अब मैं उस माहौल व सुख से वंचित नहीं होना चाहता।"
अनुरोध ने वंशराज से अनुरोध किया बोला," बाबा, अस्पताल में सिस्टर ने कहा था कि मैं आप लोगो की संजीवनी हूँ। पर नहीं बाबा, नहीं, मेरे संजीवनी आप दोनों है। मैं अपनी संजीवनी छोड़ नहीं सकता, इसलिए आप दोनों को हमारे साथ चलना है।" यह कहकर अनुरोध बाबा के गले में बाहें डालकर लटक गया और मनाने लगा।
अनुरोध की जिद पर वंशराज सहम गये, बोले," बेटा, तुम्हारे माँ-पापा के हक पर मैं आसन नहीं जमा सकता। उनके बुढ़ापे की लाठी को छिनकर मैं  अपनी लाठी नहीं बना सकता। मैं जहाँ हूँ, जैसा भी हूँ, ठीक हूँ। मैं दिवास्वप्न में नहीं फँस सकता। पहले शक्ति थी, बर्दाश्त की सीमा थी, पर अब विवश हूँ। इसलिए हमें छोड़कर अपने माँ-पापा का ध्यान रखों। इसी में तुम्हारी भलाई है।"
" बाबा, आपने कैसे सोच लिया कि मैं माँ - पापा को छोड़ रहा हूँ। मुझे दिल्ली में नौकरी मिली है और रहने के लिए घर भी मिला है। मैं आप लोगो को लेकर वहीं जाऊंगा। बाबा, मैं जिस खुशहाल परिवार का सपना पाले हूँ उसमें मोहिनी की अहम् भूमिका है। मोहिनी में यदि माँ वाला गुण होता तो मैं आप लोगों के पास कदापि नहीं आता। पर मोहिनी में दादी का गुण नजर आया तो मेरा हौसला बढ़ा। वह स्वयं आप दोनों को अपने साथ रखना चाहती है इसलिए आप दोनों को लेने के लिए वह स्वयं मेरे साथ आई है।"
वंशराज घबड़ाकर बोले," नहीं बेटा नहीं, जो चोट दिल पर लगी है, उस पर तुम्हारा आना संजीवनी जैसा असर हुआ है, पर घाव अभी गहरा है। इसलिए थोड़ा समय लगेगा। अभी चलने के लिए मत कहो।"
" वक्त ही तो नहीं है, बाबा। मैंने जाने की पूरी तैयारी कर ली है। यदि आप हठ नहीं छोड़ेंगे और साथ नहीं चलेंगे, तब मैं भी नौकरी छोड़कर यहीं पड़ा रहूंगा। फिर बुढ़ापे में खिलाना और पालना अपने जवान पोता और उसकी पत्नी को। और यदि दो-चार पर-पोते और पोतियों की संख्या बढ़ गई तो अपने उपर पड़ने वाले बोझ के जिम्मेदार आप स्वयं होंगे। फिर हमसे मत कहिएगा कि बुढ़ापे में मुझे जीते जी मार डाला।"
दुख भरे माहौल में अनुरोध की बातें सबके मुरझायें चेहरे पर चमक लाने के लिए काफी था। कूकी-मोहिनी के साथ वंशराज भी मुस्कुरा दिए।
अनुरोध के इतना प्यार भरे मनुहार पर वंशराज हथियार तो डाल दिए, पर संकोच उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। वे संकुचित स्वर में बोले," तुम्हारे माँ - पापा क्या कहेंगे? तुम उनके लाडले हो। तुम्हारे घर पर उनका अधिकार पहले है। बेटा, क्यों बुढ़ापे में मुझे पाप का भागीदार बना रहे हो? मुक्ता सोचेगी मैंने उसके बेटा को वश में कर लिया है।"
"बाबा, माँ काफी बदल चुकी है। वे मेरे और मोहिनी के बिना रह नहीं सकती। और मैं आप लोगों के बिना नहीं रह सकता। बाबा, मेरा बचपन का सपना था कि सक्षम होने पर मैं आप दोनों के बीच का सेतु बनुंगा। आज वह समय आ गया है। आज आप मुझे सेतु बनने से रोकेंगे नहीं। मैं अपने परिवार के बिखरें तिनके को समेटकर ख़ुशनुमा घरौंदा बनाऊंगा। जिससे उस घरौदें में मेरे बच्चे वह दुख न झेले जो मैंने आज तक झेला है।" भावविह्वल अनुरोध अपने आँसुओं को रोक नही पाया।
वंशराज अनुरोध के आँसुओं को  पोछते हुए भावविभोर होते हुए बोले," ठीक है बेटा, जो उचित समझो, वो करो। मैं कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूँ क्योंकि बुढ़ापे में हमें भी सहारा चाहिए जो हमें परिवार में ही मिलेगा।"
" बाबा, मैंने माँ-पापा को यहीं बुला लिया है। वे शाम तक यहाँ आ जायेंगे। फिर हम लोग साथ साथ दिल्ली चलेंगे। आप लोग तैयारी कर लीजिए।"
कूकी और मोहिनी के चेहरे पर छाई मुस्कान बता रही थी कि यह निर्णय सही,सुंदर,सराहनीय और समयानुकूल है।
भावविह्वल वंशराज के दोनों हाथ आशीर्वाद के लिये उठ गये,बोले," जुग-जुग जिओ मेरे लाल। तुमने परिवार के साथ ही हमें भी जिंदा कर दिया क्योंकि परिवार के बिना जिंदगी अधुरी होती है। खुशहाल और भरे-पूरे परिवार की चाहत सभी को होती है। अब हम अपने सारे दुख-दर्द और खुशियाँ परिवार में ही समेटेंगे और बाटेंगे, पर अलग होने को कभी नहीं सोचेंगे।
अनुरोध बाबा के गले लगकर फूट पड़ा। वर्षों से दबी छुपी हुई उसकी पीड़ा आज खुशी के इस बेला पर स्वतंत्र हो बरसने को आतुर हो गई। वंशराज उसके बालों को सहलाते हुए उसे अंकों में समेटे रहे। 

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शंखनाद (कविता)